बच्चों की मौत के बाद जाग रही व्यवस्था, पहले कहां थी निगरानी?
JHANSI NEWS: लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में आग लगने से बच्चों की दर्दनाक मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। हर हादसे के बाद वही पुराना दृश्य सामने आता है—प्रशासन अचानक सक्रिय हो जाता है, जांच अभियान चलाए जाते हैं, नोटिस जारी होते हैं और फायर सेफ्टी की चेकिंग शुरू हो जाती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई वास्तव में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए होती है, या केवल जनता के गुस्से को शांत करने के लिए की जाने वाली खानापूर्ति होती है? जब किसी होटल में आग लगती है तो पूरे जिले में होटलों की जांच शुरू हो जाती है। किसी अस्पताल में हादसा हो जाए तो अस्पतालों की फायर सेफ्टी चेकिंग होने लगती है। अब कोचिंग सेंटर में दुर्घटना हुई है तो कोचिंग संस्थानों पर कार्रवाई का अभियान चल रहा है। आखिर प्रशासन की जिम्मेदारी केवल हादसे के बाद जागने तक ही सीमित क्यों है? क्या सुरक्षा मानकों का पालन करवाने के लिए किसी त्रासदी का इंतजार जरूरी है? वास्तविकता यह है कि जिले में अनेक कोचिंग सेंटर, स्कूल, अस्पताल, होटल, मैरिज हॉल, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और व्यावसायिक प्रतिष्ठान ऐसे हैं जहां फायर सेफ्टी के मानकों का पालन या तो अधूरा है या केवल कागजों तक सीमित है। कई जगह अग्निशमन यंत्र शोपीस बने हुए हैं, आपातकालीन निकास मार्ग अवरुद्ध हैं और भवन क्षमता से अधिक लोगों का संचालन किया जा रहा है। यह स्थिति किसी एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि लगभग हर क्षेत्र की है। यदि प्रशासन वास्तव में लोगों की सुरक्षा को लेकर गंभीर है तो उसे हादसों के आधार पर नहीं, बल्कि नियमित और व्यापक निरीक्षण व्यवस्था विकसित करनी होगी। फायर सेफ्टी कोई औपचारिकता नहीं बल्कि जीवन रक्षा का विषय है। सुरक्षा मानकों का पालन सभी संस्थानों पर समान रूप से और लगातार होना चाहिए, न कि केवल उस क्षेत्र में जहां हाल ही में कोई दुर्घटना हुई हो। जनता भी यह समझ चुकी है कि हादसे के बाद चलने वाले अधिकांश अभियान कुछ दिनों की सुर्खियां बनकर समाप्त हो जाते हैं। इसके बाद फिर वही लापरवाही, वही नियमों की अनदेखी और वही खतरे कायम रहते हैं। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन तात्कालिक प्रतिक्रिया की संस्कृति छोड़कर स्थायी निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था स्थापित करे। हर हादसा केवल आंकड़ा नहीं होता, उसके पीछे किसी का बेटा, बेटी, पिता या मां होती है। इसलिए फायर सेफ्टी को कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि जनसुरक्षा की सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए। अन्यथा हर अगली दुर्घटना के बाद फिर वही सवाल गूंजेगा—क्या प्रशासन किसी और हादसे का इंतजार कर रहा था?







