रोके खेमों से ज़ैनब पुकारीं, आज मेहंदी है कासिम तुम्हारी…नौहा सुन फफक पड़े अजाद
MIRZAPUR NEWS: छठी मोहर्रम पर सोमवार देर शाम तरकापुर इमाम चौक से पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के भतीजे और इमाम हसन अलैहिस्सलाम के यतीम बेटे हजरत कासिम अलैहिस्सलाम की याद में इरशाद अंसारी की अगुवाई में मेहंदी का जुलूस निकाला गया। मेहंदी की जियारत के लिए अकीदतमंदों का हुजूम उमड़ पड़ा। महिलाओं और पुरुषों ने फूल-मालाएं पेश कर अपनी-अपनी मन्नतें व मुरादें मांगीं।नज़र-ओ-नियाज़ के बाद मेहंदी इमाम चौक से उठाई गई और कर्बला की ओर रवाना हुई। जुलूस में शामिल लोग या हुसैन और या कासिम की सदाएं बुलंद कर रहे थे। पूरे रास्ते लोग मेहंदी की जियारत करते रहे और दुआएं मांगते रहे। शिया समुदाय के लोग नौहाख्वानी और मातम करते हुए जुलूस के साथ चल रहे थे। जैसे ही नौहाख्वां ने नौहा पढ़ा-रोके खेमे से ज़ैनब पुकारी, आज मेहंदी है कासिम तुम्हारी…तो हर आंख अश्कबार हो गई और पूरा माहौल गम-ए-हुसैन में डूब गया।
अंजुमन ए हैदरी नदीम हैदर पाशा, मिजराब मिर्जापुरी और अंजुमन अंसार ए हुसैन नौहाख्वान इरशाद अंसारी ने दर्द भरे नौहे पढ़े, जिन्हें सुनकर जुलूस में मौजूद अजादार फफक-फफक कर रो पड़े। नौहाख्वानी ने कर्बला के दर्दनाक मंजर को ताजा कर दिया। रास्ते भर अंजुमनें सीनाजनी और नौहाख्वानी करती रहीं। इमामबाड़ा चौराहे पर पहुंचकर अजादारों ने हजरत कासिम अलैहिस्सलाम की याद में जोरदार मातम किया। जुलूस संकट मोचन, वासलीगंज, बाटा चौराहा, घंटाघर, बसनही बाजार, त्रिमुहानी, टेढ़ी नीम, नारघाट और बल्ली के अड्डे से होते हुए अपने पारंपरिक मार्ग से इमामबाड़ा पहुंचकर संपन्न हुआ। शहर कोतवाल दयाशंकर ओझा पुलिस बल के साथ लगातार जुलूस की निगरानी करते रहे। तरकापुर से इमामबाड़ा तक सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। पुलिस प्रशासन की मुस्तैदी और सहयोग से जुलूस शांतिपूर्वक संपन्न हुआ। अंजुमन अंसार-ए-हुसैन के सदस्य इरशाद अंसारी ने बताया कि हजरत कासिम अलैहिस्सलाम की याद में निकाला जाने वाला मेहंदी का यह जुलूस लगभग 150 वर्ष पुरानी परंपरा है। पुराने लोग बताते हैं कि जब बिजली की व्यवस्था नहीं थी, तब चार लालटेनों की रोशनी में मेहंदी का जुलूस निकाला जाता था। आज भी यह परंपरा पूरी अकीदत और एहतराम के साथ निभाई जा रही है। रिवायतों के मुताबिक,शब-ए-आशूर को जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने साथियों और अहल-ए-बैत से बातचीत की, तब हजरत कासिम अलैहिस्सलाम ने अपने चाचा से पूछा कि क्या उनका नाम भी शहीदों में शामिल है। इस पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने उनसे पूछा कि मौत उनके नजदीक कैसी है। हजरत कासिम अलैहिस्सलाम ने जवाब दिया कि हक की राह में मौत उन्हें शहद से भी ज्यादा मीठी लगती है। आशूरा की सुबह हजरत कासिम अलैहिस्सलाम कई बार मैदान-ए-जंग में जाने की इजाजत मांगते रहे, लेकिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उन्हें अपने भाई इमाम हसन अलैहिस्सलाम की निशानी बताकर रोकते रहे। तभी उनकी वालिदा जनाबे उम्मे फरवा ने वह तहरीर उन्हें दिखाई, जो इमाम हसन अलैहिस्सलाम अपने बेटे के लिए छोड़ गए थे। उसमें लिखा था कि मेरे लाल कासिम अगर कभी मेरा भाई हुसैन तन्हा और मजलूम रह जाएं तो उनकी मदद में अपनी जान कुर्बान करने से पीछे न हटना।
तहरीर पढ़ने के बाद हजरत कासिम अलैहिस्सलाम अपने चाचा की खिदमत में पहुंचे और जंग में जाने की इजाजत मांगी। तहरीर पढ़कर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की आंखों से आंसू जारी हो गए। उन्होंने अपने भतीजे को सीने से लगाया और मैदान-ए-जंग में जाने की इजाजत दे दी। महज 13 वर्ष की उम्र में हजरत कासिम अलैहिस्सलाम मैदान-ए-कर्बला में उतरे और बहादुरी के साथ लड़ाई लड़ी। यजीदी फौजों ने जब उन्हें चारों तरफ से घेर लिया और लगातार हमले किए तो वह जख्मी होकर जमीन पर गिर पड़े। उस हालत में उन्होंने दर्द भरी आवाज में अपने चाचा मौला हुसैन अलैहिस्सलाम को पुकारा। हजरत कासिम की आवाज सुनकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम फौरन उनकी मदद के लिए पहुंचे, लेकिन तब तक घोड़ों की टापों से हजरत कासिम अलैहिस्सलाम के जिस्म-ए-मुबारक को पामाल (कुचल) कर दिया गया था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी चादर बिछाई और हजरत कासिम के जिस्म के टुकड़ों को इकट्ठा करके खेमों में ले आए। यह मंजर देखकर खेमों में कोहराम मच गया था और हर आंख अश्कबार हो गई। मेहंदी के जुलूस के दौरान हजरत कासिम अलैहिस्सलाम की कुर्बानी और वफा को याद कर अजादार गम में डूबे रहे। या हुसैन और या कासिम की सदाओं के बीच अजादारों ने मातम कर शहीद-ए-कर्बला को खिराज-ए-अकीदत पेश किया। इस आशय की जानकारी शाहिद वारसी ने दी।







