धर्म की रक्षा करने से ही हम सब रक्षित होंगे: जगद्गुरु
झांसी। महानगर के इसाई टोला स्थित स्टार मैरिज हाल आयोजित त्रिदिवसीय सत्संग समागम में केन्द्रीय अध्यात्म विज्ञानशाला ओंकारेश्वर जिला-खण्डवा म.प्र.से पधारे जगद्गुरू स्वामी उमाशंकर चैतन्य जी ने बताया कि "आज मनुष्यों के हर वर्ग (युवा,वयस्क, प्रौढ,महिला एवं पुरुष )"सभी के समक्ष यह प्रश्न है कि 'मैं क्या करुं?'अर्थात् मानवमात्र किंकर्तव्यविमूढता की स्थिति में है।यही स्थिति अर्जुन की थी।अष्टम अवतार भगवान श्रीकृष्णजी ने समझाया था कि तुम ज्ञान पूर्वक कर्म करो यही तुम्हारे अधिकार में है फल प्रकृति के अधीन है। आपने कहा कि ज्ञान से तात्पर्य अपने निजमूल स्वरुप को जानना है तथा हम सब का मूल स्वरूप यही प्रत्यक्ष दिखने वाला विश्वरूप परमात्मा है।अपने स्वभाव गुण से इसी की सेवा करना ही हम सबका आद्य कर्तव्य है।इसी से मानवता में परस्पर सुख व शान्ति स्थापित होगी। जीव की परिभाषा बडे ही सरल शब्दों में स्वामीजी ने बताते हुए कहा कि यही विश्वरूप परमात्मा है जो कि सबसे बडा है बडे का ही छोटे अंश को जीव कहते हैं।दोनों अभिन्न है जैसे समुद्र का पानी और पानी में उठने वाली लहर । लहर किसी भी काल में पानी से पृथक नहीं है उसी प्रकार जीव विश्वरूप ब्रम्ह से अलग नहीं है अज्ञानता से ही जीव है यथार्थ में वह ब्रम्ह का ही स्वरुप है। स्वामीजी ने बताया कि उक्त ज्ञान की परिणति आचरण में होना चाहिए उन्होंने कहा " आचारो हि प्रथमो धर्म:"होता है ।धर्म की रक्षा करने से ही हम सब रक्षित होते है।