पडरौना अंडरपास में इंजीनियरिंग फेल, करोड़ों रुपये पानी में
कुशीनगर। रेलवे द्वारा पडरौना नगर में करोड़ों की लागत से बनाया गया अंडरपास तकनीकी खामी का शिकार हो गया है। जमीन के भीतर से पानी निकलने के कारण अंडरपास में लगातार जलभराव हो रहा है। इससे निर्माण की गुणवत्ता, भूजल आकलन और जलनिकासी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
कुशीनगर तराई क्षेत्र में आता है, जहां भूजल स्तर काफी ऊपर है। ऐसे में अंडरपास बनाना भू-तकनीकी इंजीनियरिंग की परीक्षा है। सवाल है कि क्या डिजाइन से पहले मिट्टी की प्रकृति, भूजल दबाव और जलनिकासी का समुचित अध्ययन किया गया था? यदि व्यवस्थाएं डिजाइन में थीं तो जलभराव क्यों? और यदि नहीं थीं तो तकनीकी स्वीकृति किस आधार पर दी गई?
विशेषज्ञों का कहना है कि जिम्मेदारी सिर्फ ठेकेदार की नहीं है। डिजाइन तैयार करने वाले इंजीनियर, स्वीकृति देने वाले और निगरानी करने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
सिधुआ अंडरपास की विफलता से भी सबक नहीं लिया गया। वहां भी जलभराव के कारण अंडरपास चालू नहीं हो सका। इसके बावजूद पडरौना में वही चूक दोहराई गई। रेलवे को दोनों परियोजनाओं का तुलनात्मक तकनीकी ऑडिट कराना चाहिए।
अब मांग उठ रही है कि यदि तकनीकी चूक से सरकारी खजाने को नुकसान हुआ है तो जिम्मेदार इंजीनियर और अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ नुकसान की वसूली भी की जाए। सिर्फ पंप लगाकर पानी निकालना स्थायी समाधान नहीं है। रेलवे को निर्माण लागत, तकनीकी स्वीकृति और स्थायी समाधान पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
कुशीनगर। रेलवे द्वारा पडरौना नगर में करोड़ों की लागत से बनाया गया अंडरपास तकनीकी खामी का शिकार हो गया है। जमीन के भीतर से पानी निकलने के कारण अंडरपास में लगातार जलभराव हो रहा है। इससे निर्माण की गुणवत्ता, भूजल आकलन और जलनिकासी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
कुशीनगर तराई क्षेत्र में आता है, जहां भूजल स्तर काफी ऊपर है। ऐसे में अंडरपास बनाना भू-तकनीकी इंजीनियरिंग की परीक्षा है। सवाल है कि क्या डिजाइन से पहले मिट्टी की प्रकृति, भूजल दबाव और जलनिकासी का समुचित अध्ययन किया गया था? यदि व्यवस्थाएं डिजाइन में थीं तो जलभराव क्यों? और यदि नहीं थीं तो तकनीकी स्वीकृति किस आधार पर दी गई?
कुशीनगर तराई क्षेत्र में आता है, जहां भूजल स्तर काफी ऊपर है। ऐसे में अंडरपास बनाना भू-तकनीकी इंजीनियरिंग की परीक्षा है। सवाल है कि क्या डिजाइन से पहले मिट्टी की प्रकृति, भूजल दबाव और जलनिकासी का समुचित अध्ययन किया गया था? यदि व्यवस्थाएं डिजाइन में थीं तो जलभराव क्यों? और यदि नहीं थीं तो तकनीकी स्वीकृति किस आधार पर दी गई?