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भारत ने दिखाया मार्ग: स्पेन में घोषित हुई सतत जलीय कृषि के लिए क्रांतिकारी बैक्टेरियोफेज़ चिकित्सा

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📍 वैलेंसिया, स्पेन – 23 सितम्बर, 2025

जलीय कृषि (Aquaculture) के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज हुई है, जब भारतीय वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार सोनकर ने समुद्री मोती सीपियों की सर्जरी के बाद उन्हें एंटीबायोटिक-रहित उपचार से ठीक करने की विश्व की पहली तकनीक की घोषणा की। यह क्रांतिकारी खोज आज प्रतिष्ठित यूरोपियन एक्वाकल्चर सोसाइटी , Aquaculture 2025 सम्मेलन में वैलेंसिया, स्पेन में प्रस्तुत की गई।

डॉ. सोनकर ने अपने शोधपत्र “Harnessing Native Marine Bacteriophages for Post-Surgical Healing in Pearl Oysters: A Sustainable Shift from Antibiotics” में यह अभिनव तकनीक प्रस्तुत की। इसमें उन्होंने प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले समुद्री बैक्टेरियोफेज़ का उपयोग कर मोती सीपियों को सर्जिकल इम्प्लांटेशन के बाद स्वस्थ करने की प्रक्रिया बताई, जिससे एंटीबायोटिक की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त हो जाती है।

वैश्विक जलीय कृषि के लिए नया मोड़

पिछले कई दशकों से, एंटीबायोटिक जलीय कृषि में आवश्यक माने जाते रहे हैं, विशेषकर मोती सीपियों की नाजुक सर्जरी के बाद। लेकिन इनके अत्यधिक प्रयोग से एंटीबायोटिक प्रतिरोध (Antibiotic Resistance), पारिस्थितिकीय असंतुलन, और खाद्य सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।

डॉ. सोनकर की बैक्टेरियोफेज़-आधारित चिकित्सा एक सतत और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प है, जो बैक्टीरिया पर प्राकृतिक नियंत्रण प्रदान करती है और समुद्री पर्यावरण को हानि पहुँचाए बिना मोतियों को सफलतापूर्वक स्वस्थ करती है। नियंत्रित अध्ययनों में इस पद्धति ने सर्जरी के बाद उपचार में असाधारण सफलता दिखाई है, जिससे सीपियों की जीवित रहने की दर उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। यह नवाचार भविष्य में मछली और अन्य शंख-शैवाल पालन जैसे क्षेत्रों में भी उपयोगी साबित हो सकता है और एंटीबायोटिक पर वैश्विक निर्भरता घटा सकता है।

वैश्विक मंच पर भारतीय नवाचार

डॉ. सोनकर ने यह प्रस्तुति Molluscs & Other Shellfish सत्र (सत्र #40) में मंगलवार, 23 सितम्बर, 2025, प्रातः 11:30 बजे दी। यह पहला अवसर था जब इस तकनीक का सार्वजनिक प्रकटीकरण किया गया।

डॉ. सोनकर ने कहा: “यह दुनिया में पहली बार है जब समुद्री सीपियों को सर्जरी के बाद बिना एंटीबायोटिक के ठीक करने की तकनीक सार्वजनिक की जा रही है। यह भारत की स्वदेशी विज्ञान शक्ति को दर्शाता है, जो वैश्विक जलीय कृषि के लिए एक सतत और स्वस्थ भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।”

सतत विकास की दिशा में अग्रसर

यह खोज जलीय कृषि तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव स्वास्थ्य और वैश्विक स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है। एंटीबायोटिक का उपयोग घटाकर यह एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (AMR) जैसी गंभीर वैश्विक समस्या का समाधान प्रस्तुत करती है। साथ ही यह संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) का भी प्रत्यक्ष समर्थन करती है, जिनमें सतत खाद्य उत्पादन, जल-जीव संरक्षण और जिम्मेदार नवाचार शामिल हैं।

भारत अग्रणी भूमिका में

इस उपलब्धि के साथ भारत ने वैश्विक जलीय कृषि की दिशा बदलने में नेतृत्व की भूमिका निभाई है। डॉ. सोनकर का कार्य इस बात का उदाहरण है कि किस प्रकार स्थानीय पारिस्थितिकियों में निहित वैज्ञानिक नवाचार पूरी दुनिया के लिए समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं। यह न केवल खाद्य सुरक्षा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जन-स्वास्थ्य जैसे साझा वैश्विक लक्ष्यों की दिशा में भारत के योगदान को भी रेखांकित करता है।

भविष्य की ओर

इस पहली सार्वजनिक घोषणा के बाद अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों, उद्योग जगत और नीतिनिर्माताओं का ध्यान इस ओर आकर्षित होना तय है। यह तकनीक केवल मोती सीपियों की सर्जरी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि एक नए युग की शुरुआत करेगी, बैक्टेरियोफेज़-आधारित, एंटीबायोटिक-रहित जलीय कृषि का युग।


डॉ. अजय कुमार सोनकर के बारे में
डॉ. अजय कुमार सोनकर जलीय कृषि, मोती विज्ञान और समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्यात वैज्ञानिक हैं। उनका अनुसंधान पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय का उदाहरण है, जिसने वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त नवाचारों को जन्म दिया है जो स्थिरता, जैव विविधता संरक्षण और खाद्य सुरक्षा को आगे बढ़ाते हैं।