KUSHINAGAR NEWS: जनपद के विशुनपुरा विकास खंड के मनीकौरा गांव में 15वें वित्त आयोग की धनराशि से लगाए गए आरओ प्लांट में वित्तीय अनियमितता का मामला अब सिर्फ ग्राम पंचायत तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि पूरे पंचायत राज तंत्र की जवाबदेही पर सवाल खड़ा कर रहा है। अधूरे निर्माण पर लाखों रुपये के भुगतान, निर्माण सामग्री की घटिया गुणवत्ता के आरोप और जिम्मेदारों के गैरजिम्मेदाराना बयानों के सार्वजनिक होने के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
4.50 लाख की योजना, 3.66 लाख का भुगतान, काम अधूरा
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, करीब 4.50 लाख रुपये की आरओ प्लांट परियोजना में अब तक 3.66 लाख रुपये से अधिक का भुगतान किया जा चुका है, जबकि ग्रामीणों का कहना है कि कार्य अब भी अधूरा है। ग्रामीणों ने निर्माण में प्रयुक्त सामग्री की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए हैं। मामला सार्वजनिक हुए एक पखवाड़ा बीत चुका है, लेकिन विभाग और प्रशासन की चुप्पी ने नए संदेह खड़े कर दिए हैं।
प्रधान और सचिव के विवादित बयान
इस पूरे प्रकरण में ग्राम प्रधान नंदलाल साहनी और ग्राम सचिव राजकिशोर राय के बयान चर्चा का केंद्र बने हैं। जब मीडिया ने प्रधान से पूछा कि कार्य पूरा होने से पहले भुगतान कैसे हो गया, तो उनका जवाब था – “अधिकारी पूछेंगे तो हम उनसे बात कर लेंगे।” वहीं ग्राम सचिव ने कथित तौर पर कहा – “बजट से क्या मतलब, आप अपनी मंशा बताइए।” ग्रामीणों का सवाल है कि सरकारी धन का हिसाब पूछना अगर गलत है, तो सही क्या है?
जांच क्यों नहीं? ग्रामीणों में रोष
ग्रामीणों का कहना है कि यदि आरोप निराधार हैं तो प्रशासन जांच कराकर स्थिति स्पष्ट करे। लेकिन खबर प्रकाशित होने के बाद भी जांच शुरू न होने से लोगों को लग रहा है कि मामले को दबाया जा रहा है। उनका कहना है कि छोटी शिकायतों पर भी जांच बैठ जाती है, लेकिन लाखों रुपये के भुगतान पर सवाल उठने के बावजूद विभाग खामोश है।
नियम क्या कहते हैं
15वें वित्त आयोग की योजनाओं में सामान्यतः कार्य पूर्ण होने के बाद तकनीकी सत्यापन, माप पुस्तिका, जियो टैगिंग और फोटोग्राफी पूरी कर भुगतान किया जाता है। मनीकौरा में अधूरे कार्य पर भुगतान होने से कई सवाल उठ रहे हैं – रनिंग पेमेंट की स्वीकृति किस आधार पर दी गई, कितना कार्य पूर्ण माना गया और किस अधिकारी ने सत्यापन किया?
अब भी अनुत्तरित हैं सवाल
ग्रामीण आज भी नहीं जानते कि कुल बजट कितना था, कितना भुगतान हुआ और काम कब पूरा होगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि भुगतान की इतनी जल्दी क्या थी और किसने कार्य का सत्यापन किया। जांच और पारदर्शिता के अभाव में लोगों को लग रहा है कि कहीं न कहीं मामले को दबाने की कोशिश हो रही है।







