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लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रों का निलंबन अलोकतांत्रिक, छात्रों को तत्काल बहाल करें कुलपति-डी. पी. यादव

LUCKNOW NEWS: लखनऊ विश्वविद्यालय में फीस वृद्धि के विरोध को लेकर चल रहा छात्र आंदोलन लगातार उग्र होता जा रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा तीन छात्रों को निलंबित किए जाने के बाद परिसर का माहौल गरमा गया है। निलंबित छात्र विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर धरना देकर अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। इस बीच विभिन्न छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी छात्रों के समर्थन में आगे आने लगे हैं। जानकारी के अनुसार फीस वृद्धि को लेकर छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन और कुलपति के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। छात्रों का आरोप है कि जब उन्होंने फीस बढ़ोतरी के संबंध में कुलपति से सवाल पूछे और अपनी समस्याओं को उठाया, तो उनकी बात सुनने के बजाय प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए प्रेम प्रकाश यादव, शशि प्रकाश और हर्षित शुक्ला को निलंबित कर दिया। छात्रों का कहना है कि यह कार्रवाई उनकी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति और छात्र हितों की आवाज को दबाने का प्रयास है। निलंबन की कार्रवाई के विरोध में तीनों छात्र विश्वविद्यालय के मुख्य गेट पर धरने पर बैठ गए हैं। धरने में लगातार छात्रों की संख्या बढ़ रही है और विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ नाराजगी भी खुलकर सामने आ रही है। छात्रों का कहना है कि जब तक निलंबन वापस नहीं लिया जाता और फीस वृद्धि पर पुनर्विचार नहीं किया जाता, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। धरना स्थल पर पहुंचे समाजवादी पार्टी के नेता डी. पी. यादव ने छात्रों का समर्थन करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि किसी भी शिक्षण संस्थान में छात्रों को अपनी बात रखने और सवाल पूछने का अधिकार है। यदि छात्र अपनी समस्याओं और फीस वृद्धि जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाते हैं तो प्रशासन का दायित्व है कि वह उनकी बात सुने और समाधान निकाले, न कि दंडात्मक कार्रवाई करे। डी.पी. यादव ने कहा कि विश्वविद्यालय के कुलपति को तानाशाही रवैया छोड़कर छात्रों के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों की आवाज को दबाने का प्रयास लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। उन्होंने मांग की कि निलंबित छात्रों को तत्काल बहाल किया जाए, फीस वृद्धि के निर्णय को वापस लिया जाए तथा छात्र हितों से जुड़े अन्य मुद्दों पर भी गंभीरता से विचार किया जाए।उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विचारों और संवाद की परंपरा का भी प्रतीक होता है। ऐसे में छात्रों की मांगों को सुनने के बजाय उन्हें दंडित करना उचित नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि छात्रों की मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है। धरने पर बैठे छात्रों ने भी स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि छात्र हितों की रक्षा के लिए है। उनका कहना है कि लगातार बढ़ रही फीस के कारण आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम वर्गीय परिवारों के छात्रों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। ऐसे में फीस वृद्धि को वापस लिया जाना चाहिए ताकि सभी छात्रों को समान अवसर मिल सकें। फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं छात्रों का धरना जारी है और विश्वविद्यालय परिसर में स्थिति पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। छात्र संगठनों का कहना है कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा।