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कर्बला की जंग दहशतगर्दी और जुल्म के खिलाफ थी, यज़ीद जीतकर भी हार गया: मुं.सरफराज सागर

मुहर्रम से जुड़ी हुसैन के शहादत की कुछ ख़ास दास्तां

KUSHINAGAR NEWS: मुहर्रम की सातवीं तारीख पर शहीद-ए-कर्बला की याद में वरिष्ठ पत्रकार मुं. सरफराज सागर ने एक बयान रखा,जिसमें शहीद-ए-कर्बला को खिराज-ए-अकीदत पेश की गई। आपको बता दें कि मुं.सरफराज सागर ने कहा कि आज से करीब 1400 साल पहले सन 680 ईस्वी में कर्बला के मैदान में लड़ी गई जंग दहशतगर्दी और जुल्म के खिलाफ थी। उन्होंने कहा कि यह हक़ और बातिल की लड़ाई थी, जिसमें यज़ीद जीतकर भी हार गया, जबकि हज़रत एमाम हुसैन शहादत के बाद भी विजेता बन गए। जबकि कर्बला का वाकया केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि कयामत तक आने वाली उम्मत के लिए सब्र,धैर्य और सच्चाई पर अड़े रहने का अज़ीम पैगाम है। कर्बला सिखाती है कि जब ईमान की हिफाजत का सवाल हो तो एक मोमिन भूख, प्यास, तकलीफ, जुल्म और मौत से भी नहीं घबराता और हर हाल में हक़ पर कायम रहता है। ग़ौरतलब हो कि इमाम हुसैन ने दीन की सरबुलंदी के लिए कुर्बानी दी सागर ने कहा कि हज़रत इमाम हुसैन ने अपने नाना जान के दीन की बका और सरबुलंदी के लिए अपने पूरे कुनबे और जांनिसार साथियों को राह-ए-खुदा में कुर्बान कर दिया, लेकिन बातिल के सामने सिर नहीं झुकाया। यही वजह है कि सदियां गुजर जाने के बाद भी दुनिया का हर सच्चा आशिक-ए-रसूल इमाम हुसैन को अकीदत के साथ याद करता है।। आपको बताते चलें कि केवल मोहब्बत का दावा काफी नहीं है। सच्ची मोहब्बत वही है, जिसमें इंसान इमाम हुसैन की सीरत, दीन पर इस्तिकामत, सुन्नत की पैरवी और शरीयत की पाबंदी को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाए। उन्होंने आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान फाजिल-ए-बरेलवी की तालीमात पर मजबूती से अमल करने का आह्वान किया। उन्होंने अपने आखिर अल्फाजों में बयां करते हुए मोहर्रम पर्व पर जुलूस निकालने को लेकर अमन शांति की अपील की और मोहर्रम पर्व को एहतियात के साथ कदर करने की हिदायत दी।