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नौ मोहर्रम पर शबे आशूर की मजलिस आयोजित, इमाम हुसैन की कुर्बानी को किया याद

आब्दी मंजिल पर हुआ अंगारों पर मातम, “लब्बैक या हुसैन” की सदाओं से गूंजा माहौल
PRATAPGARH NEWS: थाना सुल्तानपुर घोष क्षेत्र के बहेरा सादात गांव में नौ मोहर्रम (शबे आशूर) के मौके पर करबला के शहीदों की याद में मजलिसों और अज़ादारी का सिलसिला जारी रहा। इसी क्रम में साइबर जर्नलिस्ट एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार शहंशाह आब्दी के आवास आब्दी मंजिल पर एक मजलिस का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने शिरकत की। मजलिस के बाद चुप ताज़िया उठाया गया और गांव में गश्त कराया गया। इसके उपरांत आब्दी मंजिल परिसर में बच्चों और युवाओं ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मोहब्बत में जलते हुए अंगारों पर मातम किया। इस दौरान “लब्बैक या हुसैन” की सदाओं से पूरा वातावरण गूंज उठा। कार्यक्रम में आसपास के एक दर्जन से अधिक गांवों के लोगों ने भाग लिया। वहीं मजलिस को खिताब करते हुए जनपद हरदोई के बराहीं सादात से तशरीफ लाए मौलाना मीर वहेब अब्बास ने करबला की शहादत और शबे आशूर की अहमियत पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस्लामी इतिहास में नौ मोहर्रम की रात इंसानियत, सब्र, इबादत और कुर्बानी की सबसे महान रातों में से एक है। उन्होंने कहा कि जब यज़ीद ने अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बैअत की मांग की और इमाम ने अन्याय के सामने झुकने से इंकार कर दिया, तब करबला का वह ऐतिहासिक संघर्ष शुरू हुआ जिसने दुनिया को हक़ और बातिल का फर्क समझाया। मौलाना ने कहा कि करबला में अहलेबैत और उनके साथियों पर पानी बंद कर दिया गया था। मासूम बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने प्यास की कठिन परीक्षा झेली, लेकिन इमाम हुसैन ने सत्य और न्याय के मार्ग से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। मौलाना मीर वहेब अब्बास ने बताया कि शबे आशूर की रात इमाम हुसैन ने अपने साथियों को जाने की अनुमति दी थी, लेकिन सभी ने वफादारी का परिचय देते हुए आखिरी सांस तक साथ निभाने का संकल्प लिया। उन्होंने कहा कि उस रात खेमों में मातम नहीं बल्कि इबादत, कुरआन की तिलावत, दुआ और सज्दों का माहौल था। उन्होंने हुर इब्ने यज़ीद रियाही के तौबा कर हक़ का साथ चुनने की घटना का भी उल्लेख किया और कहा कि करबला का संदेश अत्याचार के खिलाफ डटकर खड़े होने का संदेश है। मौलाना ने कहा कि 10 मोहर्रम यानी यौमे आशूरा वह दिन है जिसने इंसानी इतिहास को नई दिशा दी। इमाम हुसैन और उनके 72 वफादार साथियों की कुर्बानी ने इंसानियत, न्याय, सत्य और इस्लाम की मूल शिक्षाओं को हमेशा के लिए जीवित कर दिया। कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए थाना सुल्तानपुर घोष से उपनिरीक्षक दिलीप यादव पुलिस बल के साथ मौजूद रहे। अज़ादारी और मजलिस का कार्यक्रम शांतिपूर्ण एवं श्रद्धापूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।