थानों में सुनवाई नहीं, कप्तान-आईजी के दरबार में फरियादियों का जमावड़ा आईजीआरएस में अव्वल झांसी की जमीनी हकीकत पर सवाल, न्याय के लिए दर-दर भटक रहे पीड़ित
झांसी। थानों में सुनवाई न होने की शिकायतें पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही हैं। अपनी फरियाद लेकर थाने पहुंचने वाले पीड़ित जब निराश होते हैं, तो उन्हें न्याय की आस में पुलिस कप्तान और आईजी के दरबार तक पहुंचना पड़ता है। लेकिन यहां भी यदि उन्हें दोबारा संबंधित थाने जाने की सलाह मिल जाए, तो सवाल उठता है कि आखिर पीड़ित अपनी फरियाद लेकर जाए तो कहां जाए?
एक ही समस्या के लिए थाने से लेकर उच्चाधिकारियों के कार्यालयों तक चक्कर काटना आम नागरिक की परेशानी बढ़ाता है। सवाल यह भी है कि जब कोई पीड़ित थाने में सुनवाई न होने की शिकायत लेकर आला अधिकारियों तक पहुंचता है, तो उसकी समस्या की स्वतंत्र समीक्षा क्यों नहीं की जाती? क्या संबंधित थाना स्तर पर जवाबदेही तय होती है या फरियादी को फिर उसी व्यवस्था के हवाले कर दिया जाता है, जिससे निराश होकर वह बाहर निकला था?
दूसरी ओर, आईजीआरएस शिकायत निस्तारण में झांसी के प्रदेश में अव्वल रहने के दावे किए जाते हैं। ऐसे में सवाल है कि रैंकिंग बेहतर होने के बावजूद फरियादियों को अधिकारियों के दरबार तक क्यों पहुंचना पड़ रहा है? शिकायत निस्तारित दर्ज होना और पीड़ित को वास्तविक न्याय मिलना दो अलग-अलग बातें हैं।
यदि आईजीआरएस पर निस्तारित शिकायतों के शिकायतकर्ताओं से सीधे संपर्क कर पूछा जाए कि उनकी समस्या वास्तव में हल हुई या नहीं, तो निस्तारण की जमीनी स्थिति स्पष्ट हो सकती है। जरूरत है कि केवल पोर्टल के आंकड़ों पर भरोसा करने के बजाय शिकायतकर्ता की संतुष्टि को भी कसौटी बनाया जाए।
अब सवाल पुलिस के आला अधिकारियों से है कि थानों में सुनवाई सुनिश्चित करने और बार-बार चक्कर काटने को मजबूर फरियादियों को राहत दिलाने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे? क्योंकि पुलिस की सफलता केवल रैंकिंग से नहीं, बल्कि पीड़ित को मिलने वाले न्याय से तय होती है। कागजों पर निस्तारण के दावे अपनी जगह, लेकिन फरियादी की समस्या का समाधान ही पुलिस की असली परीक्षा है।