सी.एम.पी. डिग्री कॉलेज में राजभाषा पखवाड़े का भव्य शुभारंभ

‘छायावाद युगीन साहित्यिक पत्रकारिता और हिंदी भाषा’ विषय पर विद्वानों ने किया मंथन
प्रयागराज। चैधरी महादेव प्रसाद महाविद्यालय (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) की राजभाषा समिति के तत्वावधान में 15 से 30 सितंबर तक आयोजित होने वाले राजभाषा पखवाड़े का मंगलवार को कॉलेज के न्यू सभागार में भव्य शुभारंभ हुआ। उद्घाटन सत्र का मुख्य विषय ‘छायावाद युगीन साहित्यिक पत्रकारिता और हिंदी भाषा’ रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. अजय प्रकाश खरे ने की।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. रामानुज यादव ने किया। उन्होंने राजभाषा पखवाड़े के दौरान आयोजित होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी दी। उन्होंने विशेष रूप से 29 सितंबर को प्रस्तावित स्वरचित कविता पाठ प्रतियोगिता का उल्लेख किया। विषय प्रवेश करते हुए उन्होंने हिंदी को लोकव्यवहार की भाषा बताते हुए कहा कि अंग्रेजी व्यापार की भाषा और उर्दू प्यार व नफासत की भाषा के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है।
प्रो. सरोज सिंह ने मुख्य वक्ता प्रो. कुमार वीरेंद्र एवं मुख्य अतिथि श्री विनीत सिंह का स्वागत किया। उन्होंने सभागार में उपस्थित शिक्षकों, शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं का आत्मीय अभिनंदन किया।राजभाषा पखवाड़े की संयोजिका प्रो. आभा त्रिपाठी ने इसके महत्व और प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि विनीत सिंह, सचिव प्रयागराज विकास प्राधिकरण, ने छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ और निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ का उल्लेख करते हुए छायावादी काव्य की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिंदी स्वभाव से उदार और समावेशी भाषा रही है, जिसने दूसरी भाषाओं के शब्दों को सहजता से आत्मसात कर अपनी अभिव्यक्ति को समृद्ध किया है। मुख्य वक्ता प्रो. कुमार वीरेंद्र, संयोजक, राजभाषा कार्यान्वयन समिति, इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने संबोधन की शुरुआत कवि त्रिलोचन की पंक्ति ‘हिंदी कविता उन सबकी है जिनकी साँसों को आराम नहीं’ से की। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग विद्यार्थियों में आलोचनात्मक विवेक विकसित करने की परंपरा के लिए जाना जाता है।
उन्होंने कहा कि सत्ता और व्यवस्था के दमन के विरुद्ध संघर्ष में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रामरख सहगल द्वारा संपादित ‘चाँद’ और गणेश शंकर विद्यार्थी द्वारा संपादित ‘प्रताप’ जैसी पत्रिकाओं ने स्वतंत्रता चेतना और साहित्यिक विचारों को व्यापक स्तर पर जन-जन तक पहुंचाया।

साहित्यिक पत्रकारिता की समृद्ध परंपरा पर चर्चा

प्रो. वीरेंद्र ने हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता की ऐतिहासिक यात्रा पर विस्तार से चर्चा करते हुए ‘सरस्वती’, ‘माधुरी’, ‘श्री शारदा’, ‘कर्मवीर’ से लेकर हैदराबाद से प्रकाशित ‘कल्पना’ जैसी पत्रिकाओं की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने छायावाद के विकास में साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के योगदान पर भी प्रकाश डाला।
उन्होंने निराला द्वारा पंत की ‘पल्लव’ की भूमिका पर की गई प्रत्यालोचना ‘लखनऊ का वार इलाहाबाद पर’ तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा निराला को दिए गए संरक्षण और पहली नौकरी से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख किया। उन्होंने बाबूराव विष्णु पराड़कर को हिंदी संपादकों का पितामह बताते हुए राजेंद्र यादव के ‘हंस’ और रवींद्र कालिया के ‘नया ज्ञानोदय’ के माध्यम से हिंदी साहित्य में नई रचनाशीलता को मिले मंच की चर्चा की।

हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की सातवीं आधिकारिक भाषा बनाने की मांग

प्रो. कुमार वीरेंद्र ने 1826 में ‘उदंत मार्तंड’ के प्रकाशन से लेकर 2026 तक हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के गौरवशाली इतिहास को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हिंदी की जड़ें अत्यंत गहरी हैं और इसका वैश्विक प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने मांग की कि संयुक्त राष्ट्र संघ की छह आधिकारिक भाषाओं के साथ हिंदी को सातवीं आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. नफीस अहमद ने मुख्य वक्ता प्रो. कुमार वीरेंद्र, मुख्य अतिथि श्री विनीत सिंह, मंचस्थ विद्वानों, प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस अवसर पर प्रो. आभा त्रिपाठी, प्रो. दीनानाथ, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, डॉ. रंजीत सिंह, डॉ. प्रियंका गौड़, डॉ. पूजा गौंड़, डॉ. रमाशंकर सिंह, डॉ. राजेंद्र यादव सहित महाविद्यालय के अनेक प्राध्यापक, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
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