भदोही वूलन कालीन मार्क से कालीन उत्पादों को मिलेगा तकनीकी गुणवत्ता का प्रमाण
भदोही। भारतीय कालीन प्रौद्योगिकी संस्थान (प्प्ब्ज्), भदोही ने ऊन एवं ऊन मिश्रित कालीनों की गुणवत्ता प्रमाणित करने के लिए ‘वूलन कालीन मार्क’ लेबल तैयार किया है। वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन केंद्रीय ऊन विकास बोर्ड, जोधपुर द्वारा प्रायोजित परियोजना के तहत विकसित यह लेबल भारतीय कालीन उद्योग में गुणवत्ता और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
बोर्ड के कार्यकारी निदेशक गोपाल सिंह भाटी ने बताया कि वूलन कालीन मार्क किसी कालीन के नमूने में प्रयुक्त ऊन की मात्रा को 80-100 प्रतिशत तथा 50-79 प्रतिशत की श्रेणियों में वर्गीकृत करने में सक्षम होगा। परियोजना के प्रमुख अन्वेषक डॉ. बेबी दास गुप्ता ने बताया कि परीक्षण के बाद लेबल पर कालीन के प्रमुख गुणवत्ता मानकों की जानकारी दर्ज की जाएगी।
इस लेबल में क्यूआर कोड और आरएफआईडी चिप भी होगी। क्यूआर कोड स्कैन करने पर उत्पाद की पहचान के साथ उसकी तकनीकी जानकारी तत्काल प्राप्त की जा सकेगी, जबकि आरएफआईडी चिप लेबल के दुरुपयोग को रोकने में मदद करेगी। लेबल को कालीन के नमूने पर आसानी से लगाया जा सकता है।
वूलन कालीन मार्क के माध्यम से कालीन में इस्तेमाल कच्चे माल, निर्माण प्रक्रिया, गुणवत्ता और रखरखाव से जुड़ी जानकारी निर्माता से लेकर उपभोक्ता तक उपलब्ध कराई जा सकेगी। लेबल के लिए निर्माता को पहले डीकेएम पोर्टल पर पंजीकरण कराना होगा। इसके बाद नमूना जमा कर परीक्षण कराया जाएगा और निर्धारित मानकों के आधार पर लेबल जारी किया जाएगा।
यह पहल भारतीय कालीनों की गुणवत्ता और पारदर्शिता को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रमाणित करने में सहायक हो सकती है। प्प्ब्ज् भदोही के निदेशक डॉ. राजीव कुमार वार्ष्णेय ने बताया कि शुरुआती दौर में इस लेबल को बढ़ावा देने के लिए इसकी कीमत लागत मूल्य पर रखी गई है। उन्होंने निर्माण प्रक्रिया में कालीन निर्यातकों के सहयोग की सराहना की। इस अवसर पर प्प्ब्ज् से डॉ. एस.के. पाल, डॉ. आर.के. मलिक, डॉ. अनु मिश्रा, डॉ. श्रवण कुमार गुप्ता और डॉ. दर्पण सिंह तथा ऊन विकास बोर्ड से अनुराग पुरोहित मौजूद रहे।
बोर्ड के कार्यकारी निदेशक गोपाल सिंह भाटी ने बताया कि वूलन कालीन मार्क किसी कालीन के नमूने में प्रयुक्त ऊन की मात्रा को 80-100 प्रतिशत तथा 50-79 प्रतिशत की श्रेणियों में वर्गीकृत करने में सक्षम होगा। परियोजना के प्रमुख अन्वेषक डॉ. बेबी दास गुप्ता ने बताया कि परीक्षण के बाद लेबल पर कालीन के प्रमुख गुणवत्ता मानकों की जानकारी दर्ज की जाएगी।
इस लेबल में क्यूआर कोड और आरएफआईडी चिप भी होगी। क्यूआर कोड स्कैन करने पर उत्पाद की पहचान के साथ उसकी तकनीकी जानकारी तत्काल प्राप्त की जा सकेगी, जबकि आरएफआईडी चिप लेबल के दुरुपयोग को रोकने में मदद करेगी। लेबल को कालीन के नमूने पर आसानी से लगाया जा सकता है।
वूलन कालीन मार्क के माध्यम से कालीन में इस्तेमाल कच्चे माल, निर्माण प्रक्रिया, गुणवत्ता और रखरखाव से जुड़ी जानकारी निर्माता से लेकर उपभोक्ता तक उपलब्ध कराई जा सकेगी। लेबल के लिए निर्माता को पहले डीकेएम पोर्टल पर पंजीकरण कराना होगा। इसके बाद नमूना जमा कर परीक्षण कराया जाएगा और निर्धारित मानकों के आधार पर लेबल जारी किया जाएगा।
यह पहल भारतीय कालीनों की गुणवत्ता और पारदर्शिता को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रमाणित करने में सहायक हो सकती है। प्प्ब्ज् भदोही के निदेशक डॉ. राजीव कुमार वार्ष्णेय ने बताया कि शुरुआती दौर में इस लेबल को बढ़ावा देने के लिए इसकी कीमत लागत मूल्य पर रखी गई है। उन्होंने निर्माण प्रक्रिया में कालीन निर्यातकों के सहयोग की सराहना की। इस अवसर पर प्प्ब्ज् से डॉ. एस.के. पाल, डॉ. आर.के. मलिक, डॉ. अनु मिश्रा, डॉ. श्रवण कुमार गुप्ता और डॉ. दर्पण सिंह तथा ऊन विकास बोर्ड से अनुराग पुरोहित मौजूद रहे।