नवजात की मौत पर फिर फूटा गुस्सा, आखिर कितनी लाशों के बाद जागेगा सिस्टम?
नवजात की मौत पर सौदेबाजी, पुलिस की मौजूदगी में दफन हुआ सच
KUSHINAGAR NEWS: जनपद में निजी अस्पतालों की बेलगाम व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। हमेशा विवादों में रहने वाले पडरौना स्थित किलकारी हॉस्पिटल और उसके संचालक डाॅ. कमलेश वर्मा एक बार फिर नवजात की मौत के बाद सुर्खियों में है। आरोप वही पुराने हैं। गलत इलाज, लापरवाही, मौत और फिर “समझौते” का खेल। इस बार भी एक गरीब परिवार का दीपक बुझ गया और सिस्टम फिर अस्पताल की ढाल बनकर खड़ा दिखाई दिया।
बतादे कि जनपद के खड्डा थाना क्षेत्र के सालिकपुर गांव निवासनी नंदनी पत्नी विष्णु अपने नवजात बच्चे को तेज धड़कन की शिकायत पर पडरौना बडी नहर के पटरी के किनारे स्थित किलकारी अस्पताल लेकर पहुंचे थे।हास्पिटल प्रशासन द्वारा परिवार को भरोसा दिया गया कि बच्चा ठीक हो जाएगा। छह दिन तक भर्ती रखकर इलाज के नाम पर हजारों रुपये वसूले गए, लेकिन परिजनों का आरोप है कि हालत लगातार बिगड़ती रही। आखिर में बीस हजार रुपये जमा कराने के बाद गोरखपुर रेफर कर दिया गया। परिवार का आरोप है कि तब तक मासूम की सांसें थम चुकी थीं।
कैमरे पर रोती रही मां, अंदर चलती रही “डील”
मासूम की मां जब कैमरों के सामने फूट-फूटकर डॉक्टर की लापरवाही गिना रही थी, उसी समय अस्पताल के भीतर मामला “मैनेज” करने की पटकथा लिखी जा रही थी।प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक हंगामा बढ़ते देख अस्पताल प्रबंधन ने अपने करीबी लोगों, कथित पत्रकारों और पुलिस को मौके पर बुला लिया। फिर शुरू हुआ दबाव का खेल। सबसे बड़ा सवाल पुलिस की भूमिका को लेकर उठ रहा है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार पुलिस पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के बजाय समझौते की सलाह देती दिखी। परिजनों को यह कहकर डराया गया कि यदि कार्रवाई करोगे तो नवजात का पोस्टमार्टम होगा, “इतने छोटे बच्चे की चीर-फाड़ से क्या मिलेगा?”आखिरकार चारों तरफ से दबाव, भय और मानसिक प्रताड़ना के बीच 23 हजार रुपये में समझौते की बात तय कर दी गई। आरोप है कि नवजात के पिता से दस रुपये के स्टाम्प पेपर पर लिखवाकर पूरे मामले को रफा-दफा करा दिया गया।
पैसे देकर खत्म हो जाती है मौत की जिम्मेदारी?
यक्ष प्रश्न यह है कि किसी नवजात की मौत की कीमत 23 हजार रुपये है? क्या एक स्टाम्प पेपर पर लिखवा लेने से चिकित्सकीय लापरवाही समाप्त हो जाती है?क्या पुलिस का काम समझौता कराना है या निष्पक्ष कार्रवाई करना?जानकार बताते है कि यदि किसी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत होती है और परिजन चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगाते हैं, तो स्वास्थ्य विभाग की स्वतंत्र जांच, मेडिकल बोर्ड की समीक्षा और कानूनी प्रक्रिया अनिवार्य है। लेकिन कुशीनगर में तस्वीर उलट दिखाई देती है। यहां मौत के बाद जांच नहीं, “सेटिंग” शुरू होती है।
यह पहला मामला नहीं, किलकारी का पुराना इतिहास भी दागदार
स्थानीय लोगों के मुताबिक किलकारी हॉस्पिटल का विवादों से पुराना नाता रहा है। अस्पताल पर पहले भी कई बार नवजात व बच्चों के इलाज में लापरवाही के आरोप लग चुके हैं।कभी गलत इंजेक्शन लगाने का आरोप लगा, कभी हालत बिगड़ने पर देर से रेफर करने की शिकायत, तो कभी इलाज के नाम पर मोटी रकम वसूलने के बाद मरीज की मौत होने पर हंगामा खड़ा हुआ।सूत्र बताते हैं कि पूर्व में भी कई मामलों में परिजनों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया था। कुछ मामलों में पुलिस तक शिकायतें भी पहुची बाद में समझौते की भेंट चढ़ गईं। स्थानीय लोगों का कहना है कि हर बार एक ही फार्मूला अपनाया जाता है पहले इलाज का भरोसा,फिर हालत बिगड़ने पर रेफर,उसके बाद हंगामा,और आखिर में “ले-देकर मामला खत्म”। यही वजह है कि जनपद मे इस बात की चर्चा जोरो पर है कि किलकारी हास्पिटल इलाज से ज्यादा मौत बांटने व “मैनेजमेंट” के लिए जाना जाता है।
स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी भी संदेह के घेरे में
जनपद में दर्जनों निजी अस्पताल बिना पर्याप्त संसाधनों, विशेषज्ञ चिकित्सकों और आपातकालीन सुविधाओं के संचालित हो रहे हैं। लेकिन जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति होती है। जब कोई बड़ा हादसा होता है तो कुछ दिनों तक नोटिस, जांच और बयानबाजी चलती है, फिर फाइलें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं। सवाल यह भी है कि नवजातों के इलाज जैसी संवेदनशील सेवा देने वाले अस्पतालों की नियमित मॉनिटरिंग क्यों नहीं हो रही?
किसके संरक्षण में चल रहा यह खेल?
सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग पर उठ रहा है। यदि किसी अस्पताल पर लगातार गंभीर आरोप लग रहे हैं तो अब तक उसकी उच्चस्तरीय जांच क्यों नहीं हुई?क्या सीएमओ कार्यालय को इन घटनाओं की जानकारी नहीं?क्या नवजातों की मौत सिर्फ गरीब परिवारों का निजी दुख बनकर रह गई है? क्या निजी अस्पतालों को मौत का खुला लाइसेंस मिल चुका है?और सबसे गंभीर सवाल पुलिस की भूमिका पर है। यदि मौत के बाद निष्पक्ष जांच के बजाय समझौते का दबाव बनाया जा रहा है तो फिर पीड़ित परिवार इंसाफ की उम्मीद किससे करे?
जिले में बिक रही है मजबूरी
जनपद में निजी अस्पतालों का बड़ा हिस्सा गरीबों की मजबूरी पर खड़ा दिखाई दे रहा है। गांव का गरीब आदमी बच्चे को बचाने की उम्मीद में जमीन बेच देता है, कर्ज लेता है, लेकिन बदले में उसे मिलता है चिकित्सक की लापरवाही, मौत और फिर समझौते का दबाव।
किलकारी हॉस्पिटल पर लगे लगातार आरोप अब सिर्फ एक अस्पताल का मामला नहीं रह गए हैं, बल्कि यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल बन चुके हैं। जानकार कहते है कि अगर हर मौत के बाद कुछ हजार रुपये देकर मामला दबा दिया जाएगा, तो फिर कानून, जांच और प्रशासन सिर्फ दिखावे के लिए ही रह जायेगें।







