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Home उत्तर प्रदेश ममता का बदलता स्वरूप और संस्कारों की चुनौती
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ममता का बदलता स्वरूप और संस्कारों की चुनौती

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प्रातः काल न्यूज नेटवर्क
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May 10, 2026
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    PSCHIM/BANGAL: रामनरेश प्रजापति, पत्रकार,
    – गोल्ड मेडलिस्ट जनसंचार एवं पत्रकारिता वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर उत्तर-प्रदेश भारतीय संस्कृति में “मां” केवल एक शब्द नहीं, बल्कि संवेदना, त्याग, करुणा, शक्ति और सृष्टि की आधारशिला मानी गई है। मां वह शक्ति है, जो अपने बच्चे के सुख के लिए स्वयं के कष्टों को भी सहज भाव से स्वीकार कर लेती है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में मां को भगवान से भी ऊंचा स्थान दिया गया। वेदों और उपनिषदों में “मातृ देवो भवः” का संदेश केवल धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा रहा है। मां केवल जन्म देने वाली नहीं होती, बल्कि वह जीवन को दिशा देने वाली पहली गुरु होती है। भारतीय संस्कृति में मां को देवी स्वरूप माना गया है। मां दुर्गा हैं, मां काली हैं, मां भगवती हैं, मां सरस्वती हैं। मां शक्ति हैं, मां जीवन हैं, मां अविनाशी और सर्वव्यापी हैं। मां समस्त चराचर जगत की स्वामिनी हैं। वह कण-कण में विद्यमान हैं और संपूर्ण सृष्टि की उद्गम हैं। मां की ममता के आंचल में केवल परिवार या समाज ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व और समस्त ब्रह्मांड समाहित है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में नारी और मातृत्व को पूजनीय माना गया है। समय बदलता है, समाज बदलता है और परिस्थितियां भी बदलती हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में जिस तेजी से पारिवारिक मूल्यों और रिश्तों की संवेदनाओं में परिवर्तन आया है, उसने समाज को चिंतन के लिए मजबूर कर दिया है। आज यह महसूस किया जाने लगा है कि मां शब्द की व्यापकता और उसकी ममता का वह अथाह सागर धीरे-धीरे सीमित होता जा रहा है। रिश्तों में अपनापन कम और स्वार्थ अधिक दिखाई देने लगा है। कई परिवारों में आर्थिक स्थिति, संपत्ति और भौतिक सुख-सुविधाएं रिश्तों की गहराई तय करने लगी हैं।
    यह कटु सत्य है कि आज कुछ परिवारों में मां का झुकाव उस संतान की ओर अधिक दिखाई देता है जो आर्थिक रूप से अधिक सक्षम है। जिस बेटे के पास अधिक धन, संपत्ति और वैभव है, उसके प्रति अधिक स्नेह और प्राथमिकता दिखाई जाती है, जबकि कम साधनों वाले बच्चों की भावनाएं उपेक्षित हो जाती हैं। यह स्थिति केवल परिवारों को ही नहीं तोड़ती, बल्कि समाज की मूल संरचना को भी कमजोर करती है। मां यदि अपने बच्चों के बीच भेदभाव करने लगे, तो परिवार में प्रेम, विश्वास और एकता की नींव हिलने लगती है।
    भारतीय संस्कृति ने हमेशा मां को आदर्श रूप में प्रस्तुत किया है। त्रेता युग में माता कौशल्या ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को ऐसे संस्कार दिए, जिन्होंने उन्हें सत्य, धर्म और कर्तव्य का प्रतीक बनाया। माता सीता केवल एक पत्नी नहीं थीं, बल्कि त्याग, धैर्य और मातृत्व की सर्वोच्च प्रतिमूर्ति थीं। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने पुत्रों लव-कुश को आदर्श संस्कार देकर यह सिद्ध किया कि मां का चरित्र ही समाज की दिशा तय करता है। द्वापर युग में माता देवकी और यशोदा का उदाहरण भी अद्वितीय है। देवकी ने अपने पुत्र कृष्ण को जन्म देकर अत्याचार सहा, वहीं यशोदा ने पालन-पोषण कर मातृत्व की महानता को नई ऊंचाई दी। इन उदाहरणों में मातृत्व केवल रक्त संबंध नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग और संस्कार का स्वरूप था। यही कारण है कि भारतीय समाज आज भी इन माताओं को श्रद्धा और आदर के साथ स्मरण करता है। लेकिन आधुनिक समय में तेजी से बढ़ती भौतिकवादी सोच ने पारिवारिक मूल्यों को प्रभावित किया है।
    उपभोक्तावाद और तात्कालिक सुख की प्रवृत्ति ने रिश्तों की गरिमा को कमजोर किया है। आज समाज में ऐसे अनेक उदाहरण सामने आते हैं, जहां व्यक्तिगत इच्छाओं और क्षणिक सुखों के लिए परिवार, पति, बच्चों और सामाजिक मर्यादाओं तक की अनदेखी कर दी जाती है। यह केवल किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के कमजोर होने का संकेत है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि पूरे समाज या संपूर्ण मातृत्व को कुछ नकारात्मक घटनाओं के आधार पर नहीं परखा जा सकता। आज भी देश में करोड़ों माताएं ऐसी हैं, जो अपने बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष कर रही हैं। गांवों से लेकर महानगरों तक असंख्य महिलाएं परिवार की रीढ़ बनकर अपने बच्चों को संस्कार, शिक्षा और नैतिकता का पाठ पढ़ा रही हैं। वे कठिन परिस्थितियों में भी परिवार को टूटने नहीं देतीं। इसलिए आवश्यकता संतुलित दृष्टिकोण की है, जहां हम गिरते मूल्यों पर चिंता भी करें और सकारात्मक उदाहरणों को सम्मान भी दें। वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नई पीढ़ी को संस्कारयुक्त वातावरण कैसे मिले। बच्चों का पहला विद्यालय परिवार होता है और मां उसकी पहली गुरु। यदि परिवार में त्याग, समानता, अनुशासन और संवेदनशीलता का वातावरण होगा, तो वही बच्चे आगे चलकर समाज और राष्ट्र को नई दिशा देंगे। लेकिन यदि परिवारों में स्वार्थ, भेदभाव और केवल आर्थिक सफलता को ही महत्व मिलेगा, तो आने वाली पीढ़ियां भी उसी मानसिकता को अपनाएंगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज आधुनिकता को स्वीकार करते हुए भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहे। महिलाओं का आत्मनिर्भर होना, शिक्षा प्राप्त करना और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना अत्यंत आवश्यक है, लेकिन इसके साथ ही पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों का संतुलन भी बना रहना चाहिए। भारतीय संस्कृति ने नारी को केवल परिवार तक सीमित नहीं किया, बल्कि उसे शक्ति, ज्ञान और सृजन का प्रतीक माना। इसलिए आधुनिक नारी का दायित्व केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं, बल्कि संस्कार और सामाजिक संतुलन को बनाए रखना भी है।
    माता कौशल्या, सीता, देवकी और यशोदा जैसी आदर्श माताओं की प्रेरणा आज भी प्रासंगिक है। उनकी जीवनशैली हमें यह सिखाती है कि मां का वास्तविक स्वरूप त्याग, समानता, धैर्य और नैतिकता में निहित है। यदि वर्तमान पीढ़ी इन आदर्शों से प्रेरणा लेकर अपने बच्चों को संस्कारयुक्त वातावरण दे सके, तो समाज में बढ़ती संवेदनहीनता को रोका जा सकता है। एक स्वस्थ परिवार ही स्वस्थ समाज की नींव होता है और स्वस्थ समाज से ही मजबूत लोकतंत्र का निर्माण संभव है। जब परिवारों में प्रेम, सम्मान और संस्कार होंगे, तभी समाज में नैतिकता और सामाजिक समरसता बनी रहेगी। भारत को पुनः विश्व गुरु बनने के लिए केवल आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक शक्ति की भी आवश्यकता है। भारतीय सभ्यता सदियों से पूरे विश्व को मानवता, करुणा और संस्कार का संदेश देती रही है। आज फिर आवश्यकता है कि हम अपने पारिवारिक मूल्यों को सहेजें, रिश्तों में संवेदनाओं को जीवित रखें और मातृत्व की उस महान परंपरा को आगे बढ़ाएं, जिसने भारतीय संस्कृति को विश्व में विशिष्ट पहचान दिलाई। तभी आने वाली पीढ़ियां एक ऐसे भारत का निर्माण कर सकेंगी, जो आधुनिक भी हो और अपनी सांस्कृतिक आत्मा से भी जुड़ा रहे।
    –

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