इजरायल ने हमास की लीडरशिप को खत्म करने के लिए कतर की राजधानी दोहा में बम गिरा दिए तो पूछा जाने लगा कि बात बात पर उफा की दुहाई देने वाले देश उस वक्त कहां थे? सऊदी अरब से तो कतर की नहीं बनती। लेकिन क्या यूएई के फाइटर जेट्स ने इजरायली जेट्स का पीछा किया? इसी माहौल में मुस्लिम नाटो वाला शगूफा भी ईरान की तरफ से छेड़ा गया। मतलब कि अरब और मुस्लिम देशों का एक सैनिक संगठन जिसमें एक पर हमला हुआ तो सारे टूट पड़ेंगे वाली कसम टाइप। अभी ये चर्चा चल रही ही थी कि कि क्यों इस थ्योरी का प्रैक्टिकल मुस्किल है। तभी एक सरप्राइज मिल गया। मैक्यावली ने कहा था कि हम अक्सर एक गलती करते हैं। समुंदर जब शांत हो तब तूफान का अंदाजा नहीं लगाते। आज बात उसी तूफान की करेंगे। दरअसल,17 सितंबर को सऊदी अरब और पाकिस्तान ने एक नाटो नुमा डिफेंस पैक्ट साइन किया है। जिसमें लिखा है कि हम पर हमला मतलब तुम पर हमला और तुम पर हमला मतलब हम पर हमला। इस वादे ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मान लीजिए कि भारत और पाकिस्तान के बीच फिर जंग भड़ गई या फिर ऑपरेशन सिंदूर जैसे हालात बन गए तो क्या सऊदी अरब भी अपनी ताकत भारत के खिलाफ झोक देगा। चीन और तुर्की तो पीछे से पाकिस्तान के साथ थे ही। क्या अब सऊदी अरब का खुला समर्थन भी उसे मिल जाएगा। क्या सऊदी अब पाकिस्तान की सेना पर पैसे लगाएगा। वही पैसा पाकिस्तान के नापाक मंसबों पर खर्चा होगा या फिर ये पाकिस्तान का ख्वाब है। लेकिन अगर ये सच है तो आखिर सऊदी ऐसा कर क्यों रहा है। भारत से रिश्ते ताक पर रख कर पाकिस्तान को पालने का क्या मतलब है? सबसे दिलचस्प सवाल ये है कि क्या अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस डील के हिमायती हैं।
सऊदी-पाक में नाटो वाला समझौता
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ डिफेंस अग्रीमेंट ये भी कहता है कि अगर एक देश पर हमला हुआ तो दूसरा देश उसे खुद पर भी हमला मानेगा। कुछ वैसा ही समझौता जैसा नाटो के सदस्य देशों के बीच है। भले कहा जा रहा है कि ये समझौता पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच लंबे ऐतिहासिक रिश्तों का परिणाम है। लेकिन भारत के लिए ये डेवलपमेंट चिंता बढ़ाने वाला है। पाकिस्तान और सऊदी अरब की ओर से फिलहाल सैन्य करार के सभी प्रावधानों को सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन पाक द्वारा सऊदी को एटमी सुरक्षा देने के सवाल पर एक सऊदी अफसर ने दावा किया कि करार में सभी सैन्य विकल्पों का प्रयोग किया जा सकता है। पाक और सऊदी अरब का कहना है कि पिछले कुछ समय से दोनों देशों के बीच इस सैन्य करार के बारे में गहन विमर्श चल रहा था। अब डील को फाइनल किया गया है। पाक और सऊदी अरब का कहना है कि ये करार किसी भी तीसरे देश को मद्देनजर रखते हुए नहीं किया गया है।







