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जिस मनुष्य के कर्म अच्छे होते हैं, उसके जीवन में कभी अंधेरा नहीं आता-प्रणव चैतन्य महाराज

MIRZAPUR NEWS: (अमरेश चंद्र पाण्डेय) भारतीय संस्कृति में गुरु की महिमा अनंत और अपरंपार है। “गु” का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और “रु” का अर्थ है प्रकाश (ज्ञान), यानी गुरु वह है जो हमारे जीवन के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। उपरोक्त विचार कैलहट स्थित सिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर के पूज्यनीय महंत, संत श्री प्रणव चैतन्य महाराज जी गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर भक्तों के बीच व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु के बिना कोई भी भवसागर पार नहीं कर सकता। गुरु ही भगवान तक पहुंचाने का मार्ग बताते हैं। भारतीय परंपरा में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश मानी ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है। चैतन्य महाराज जी ने कहा कि ईश्वर और गुरु एक साथ खड़े हों तो पहले गुरु का चरण पकड़ने की शास्त्रों ने महत्ता बताई है। गुरु ही ईश्वर की पहचान कराता है और उसे पाने के लिये खुद गुरु पुल बन जाता है और ईश्वर से जोड़ देता है। प्रणव चैतन्य महाराज जी कर्म पर विशेष जोर देते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य में सबके प्रति दया के भाव हों, गिरते को संभाल लेने की तत्परता हो, दीन-दुखियों के दुख में भागीदार बनने की ललक, जिसके अंदर दूसरों के आंसू पोछने की भावना हो तथा अपनी कटु वाणी से जो अन्य का दिल न दुखाता हो। समझिये ऐसे मनुष्य ईश्वर के प्रिय हैं और उनके नजदीक पहुंच रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिस मनुष्य के कर्म अच्छे होते हैं, उसके जीवन में कभी अंधेरा नहीं आता।