प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और जलवायु-अनुकूल कृषि सतत भविष्य की आधारशिला : कुलपति ओजोन परत संरक्षण, हरित ऊर्जा और पर्यावरणीय समाधानों पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
झाँसी। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झाँसी में शुक्रवार को ओजोन परत संरक्षण, हरित ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन एवं सतत पर्यावरणीय समाधानों पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। विश्वविद्यालय के उद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय तथा राष्ट्रीय पर्यावरण विज्ञान अकादमी (एनईएसए), नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने पर्यावरण संरक्षण, जलवायु-अनुकूल कृषि और वैज्ञानिक नवाचारों को सतत भविष्य के लिए आवश्यक बताया।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. अशोक कुमार सिंह ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा और प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण कृषि के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। इनसे निपटने के लिए सूखा एवं अधिक तापमान सहन करने वाली फसल किस्मों के विकास, जैव विविधता संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य और जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। उन्होंने कृषि वानिकी, कार्बन पृथक्करण और जलवायु-स्मार्ट कृषि को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
भारत मौसम विज्ञान विभाग, नई दिल्ली के पूर्व अपर महानिदेशक डॉ. केके सिंह ने ओजोन परत के क्षरण तथा जलवायु परिवर्तन के कृषि पर प्रभावों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि समतापमंडल की ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है, जबकि धरातल के निकट मौजूद ओजोन वायु प्रदूषक है। उन्होंने कहा कि मौसम संबंधी आंकड़ों, पूर्वानुमान और समय पर कृषि-मौसम सलाह से किसानों को बुवाई, सिंचाई तथा फसल प्रबंधन में सहायता मिल सकती है। जल संरक्षण, फसल विविधीकरण और जलवायु-अनुकूल तकनीकों को अपनाना समय की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय पर्यावरण विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष डॉ. शकील ए. खान ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को वैश्विक पर्यावरणीय सहयोग की ऐतिहासिक सफलता बताया। उन्होंने कहा कि ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करने के लिए 1987 में अपनाया गया यह समझौता पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने नवीकरणीय ऊर्जा, हरित अर्थव्यवस्था, चक्रीय अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।
उद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. मनीष श्रीवास्तव ने ओजोन परत संरक्षण की वैश्विक प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं वंदे मातरम् के साथ हुआ। एसोसिएट डीन प्रो. मनमोहन जे. डोबरियाल ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की।
संगोष्ठी के तकनीकी सत्रों में डिजिटल प्रौद्योगिकी, हरित नवाचार, जलवायु-स्मार्ट पर्यावरणीय समाधान, वानिकी, ओजोन, सतत कृषि और मानव स्वास्थ्य जैसे विषयों पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स आधारित पर्यावरणीय निगरानी तथा मृदा गुणवत्ता सुधार से जुड़े शोध प्रस्तुत किए। पोस्टर एवं ऑनलाइन सत्रों में भी जल संसाधन, हरित तकनीक, राइजोबैक्टीरिया और अधिक तापमान में फसलों की सहनशीलता जैसे विषयों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रियंका शर्मा ने किया तथा कार्यक्रम सचिव डॉ. पवन कुमार ने अतिथियों, विशेषज्ञों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के अधिकारी, शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।