होर्मुज़ में ईरान की रणनीति को चुनौती!
ईरान युद्ध के बीच फ़ारस की खाड़ी के अरब देशों ने अपने तेल निर्यात को पटरी पर लाने में बड़ी कामयाबी हासिल की है होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जारी तनाव के बावजूद सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने वैकल्पिक पाइपलाइनों, दूसरे बंदरगाहों और समुद्री मार्गों का इस्तेमाल बढ़ाकर तेल की आपूर्ति को युद्ध-पूर्व स्तर के करीब पहुंचा दिया है। दूसरी ओर, अमेरिकी समुद्री नाकेबंदी के चलते ईरान का तेल निर्यात लगभग ठप रहने का दावा किया गया है।यह घटनाक्रम ईरान की उस रणनीति के लिए अहम चुनौती है, जिसके तहत होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाज़ों की आवाजाही बाधित कर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बनाने की कोशिश की गई थी। हालांकि, निर्यात में सुधार का मतलब यह नहीं है कि समुद्री मार्ग पूरी तरह सुरक्षित हो गया है या ईरान की दबाव बनाने की क्षमता समाप्त हो गई है।सितंबर में रोजाना 1.65 करोड़ बैरल तेल का निर्यातटैंकर ट्रैकिंग संस्था केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, 1 से 28 सितंबर के बीच क्षेत्र से प्रतिदिन कम से कम 1.65 करोड़ बैरल कच्चे तेल और कंडेनसेट का निर्यात हुआ। इस आंकड़े में ईरान का तेल शामिल नहीं है और यह मात्रा युद्ध से पहले के औसत के बराबर बताई गई है।रिपोर्ट के अनुसार, करीब 60 प्रतिशत तेल यानी लगभग 99 लाख बैरल प्रतिदिन होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरा। वहीं, लगभग 23 प्रतिशत तेल ओमान की खाड़ी के तट पर स्थित बंदरगाहों, मुख्य रूप से फ़ुजैरा, से लोड किया गया। करीब 17 प्रतिशत तेल लाल सागर के रास्ते बाहर भेजा गया।इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि खाड़ी देशों ने निर्यात के लिए एक ही समुद्री रास्ते पर निर्भरता घटाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।वैकल्पिक रास्तों से बदली तेल सप्लाई की तस्वीरकेप्लर के अनुसार, सितंबर में क्षेत्र से निर्यात किए गए कुल तेल का करीब 40 प्रतिशत होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर नहीं गुजरा। इसे पाइपलाइनों के जरिए लाल सागर और ओमान की खाड़ी के बंदरगाहों तक पहुंचाया गया युद्ध से पहले ऐसे निर्यात का हिस्सा लगभग 17 प्रतिशत था।सऊदी अरब की लाल सागर तक जाने वाली पाइपलाइन और संयुक्त अरब अमीरात की फ़ुजैरा तक पहुंचने वाली पाइपलाइन ने इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई है। इन वैकल्पिक व्यवस्थाओं के चलते होर्मुज़ में तनाव के बावजूद क्षेत्र के अन्य तेल उत्पादक देशों को निर्यात जारी रखने में मदद मिली। ईरान का तेल निर्यात लगभग शून्य?केप्लर के अनुमान के मुताबिक, जुलाई में अमेरिकी नाकेबंदी दोबारा शुरू होने के बाद सितंबर में होर्मुज़ से ईरानी तेल की आवाजाही लगभग शून्य रही। युद्ध से पहले ईरान प्रतिदिन करीब 17 लाख बैरल तेल निर्यात करता था। इस मात्रा को शामिल करने पर सितंबर में क्षेत्र का कुल निर्यात युद्ध-पूर्व स्तर के लगभग 91 प्रतिशत तक पहुंचता है।ये आंकड़े बताते हैं कि खाड़ी के दूसरे तेल उत्पादकों ने आपूर्ति बनाए रखने की कोशिश की है, जबकि ईरान का निर्यात गंभीर रूप से प्रभावित बताया जा रहा है।क्या होर्मुज़ पर ईरान का दबाव कमजोर पड़ा?ईरान की रणनीति का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने जहाज़ों को रोका गया या कितने तेल टैंकर अपने गंतव्य तक पहुंचे। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के ईरान मामलों के वरिष्ठ विश्लेषक हमीदरेज़ा अज़ीज़ी के अनुसार, ईरान के अधिकारी जिस रणनीति को “स्मार्ट कंट्रोल” कहते हैं, उसका उद्देश्य समुद्री आवाजाही में बाधा और जोखिम बढ़ाकर ऊर्जा बाजार को प्रभावित करना है।इस रणनीति के तहत हर जहाज़ को रोकना जरूरी नहीं होता। यदि हमले की आशंका से जहाज़ मालिक, बीमा कंपनियां और तेल खरीदार जोखिम लेने से बचते हैं, तो परिवहन की लागत बढ़ सकती है और व्यापार प्रभावित हो सकता है।इसलिए निर्यात के आंकड़ों में सुधार के बावजूद होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जोखिम और अनिश्चितता बनी रह सकती है।अमेरिकी सैन्य समर्थन से टैंकरों को मददसुरक्षा कंपनी ईओएस रिस्क ग्रुप के वरिष्ठ खुफिया विश्लेषक मार्टिन केली ने बीबीसी वेरिफाई को बताया कि अमेरिकी समर्थन में जहाज़ों को हवाई सुरक्षा देना, चेतावनी जारी करना और ड्रोन, मिसाइल या छोटी नौकाओं से पैदा होने वाले खतरों को रोकने की कोशिश शामिल है।हालांकि, अमेरिकी समर्थन के बावजूद समुद्री मार्ग पूरी तरह सुरक्षित नहीं हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, ओमान के तट के पास से गुजरने वाले दक्षिणी मार्ग का इस्तेमाल करने वाले कुछ जहाज़ों पर भी हमलों का खतरा बना हुआ है।ब्रिटेन के मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस सेंटर (यूकेएमटीओ) ने 21 सितंबर को एक तेल टैंकर से अज्ञात प्रक्षेप्य के टकराने और 23 सितंबर को एक मालवाहक जहाज़ में प्रक्षेप्य टकराने के बाद आग लगने की जानकारी दी थी। तेल बाजार के लिए आगे भी चुनौतीहोर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति के लिहाज से एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है यहां तनाव बढ़ने से जहाज़ों की आवाजाही, बीमा लागत, परिवहन और ऊर्जा कीमतों पर असर पड़ सकता है।फिलहाल खाड़ी देशों के वैकल्पिक मार्गों ने तेल निर्यात को सहारा दिया है, लेकिन जहाज़ों पर हमलों की आशंका और सैन्य तनाव बरकरार है। ऐसे में आने वाले समय में स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि समुद्री सुरक्षा कितनी कायम रहती है, वैकल्पिक मार्ग कितनी क्षमता से काम करते हैं और ईरान-अमेरिका के बीच टकराव किस दिशा में बढ़ता है।