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चेयरमैन का ‘कास्टिंग वोट’ VS ट्रस्ट्स का ‘वीटो’, टाटा बोर्डरूम में फिर क्यों गूंज रहा 2021 का सुप्रीम कोर्ट फैसला?
टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर बोर्ड में हुए मतदान ने कंपनी के Articles of Association और टाटा ट्रस्ट्स के विशेष मतदान अधिकारों पर पुरानी कानूनी बहस फिर सामने ला दी है। विवाद का केंद्र यह है कि क्या बोर्ड चेयरमैन का ‘कास्टिंग वोट’ ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की अलग से जरूरी सहमति की शर्त को पार कर सकता है।
नई दिल्ली। टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी Tata Sons में चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर बोर्डरूम में उठा विवाद अब कंपनी के शासन ढांचे और कानूनी अधिकारों तक पहुंच गया है। 17 सितंबर 2026 की बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन को एक और पांच साल के कार्यकाल के लिए मंजूरी दी गई, लेकिन टाटा ट्रस्ट्स ने इस प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाया है।
विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बैठक में टाटा ट्रस्ट्स के दो नामित निदेशकों—नोएल टाटा और वीनू श्रीनिवासन—के रुख अलग-अलग रहे। नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का विरोध किया, जबकि वीनू श्रीनिवासन ने समर्थन किया। इसके बाद बैठक की अध्यक्षता कर रहे हरीश मनवानी के कास्टिंग वोट से प्रस्ताव को मंजूरी मिली।
आखिर विवाद है किस बात पर?
टाटा ट्रस्ट्स का तर्क है कि Tata Sons के Articles of Association में कुछ महत्वपूर्ण फैसलों के लिए ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों के बहुमत की affirmative vote यानी स्पष्ट समर्थन जरूरी है। ट्रस्ट्स के मुताबिक, सामान्य बोर्ड बहुमत या चेयरमैन का कास्टिंग वोट इस अलग शर्त को खत्म नहीं कर सकता।
दूसरी ओर, Tata Sons की ओर से यह तर्क सामने आया है कि बराबरी की स्थिति में चेयरमैन का कास्टिंग वोट इस्तेमाल किया जा सकता है और इसी आधार पर बोर्ड के फैसले को वैध माना गया है। इस कानूनी व्याख्या को लेकर विशेषज्ञों की राय भी अलग-अलग सामने आई है।
2021 का सुप्रीम कोर्ट फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
मामला सीधे तौर पर 2021 के फैसले का नया फैसला नहीं है। इसका संबंध Cyrus Investments Pvt. Ltd. बनाम Tata Sons Ltd. मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा Tata Sons के Articles में टाटा ट्रस्ट्स के विशेष अधिकारों पर की गई व्याख्या से है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों से जुड़े विशेष affirmative voting rights की वैधता को बरकरार रखा था।
यही वजह है कि 2026 के मौजूदा विवाद में 2021 के फैसले का संदर्भ दिया जा रहा है। सवाल यह है कि उस फैसले में मान्य किए गए विशेष अधिकारों की व्याख्या मौजूदा परिस्थिति में कैसे लागू होगी—खासकर तब, जब ट्रस्ट्स के दो नामित निदेशक ही किसी प्रस्ताव पर एकमत न हों।
‘वीटो’ का मतलब क्या है?
यहां ‘वीटो’ शब्द का इस्तेमाल सामान्य राजनीतिक वीटो के अर्थ में नहीं है। Tata Sons के Articles में ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के लिए कुछ मामलों में affirmative voting requirement है। इसका व्यावहारिक प्रभाव यह हो सकता है कि कुछ महत्वपूर्ण बोर्ड प्रस्तावों को ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के आवश्यक समर्थन के बिना आगे बढ़ाना मुश्किल हो।
मौजूदा विवाद की खास बात यह है कि ट्रस्ट्स के दोनों नामित निदेशक अलग-अलग पक्ष में खड़े हो गए। इसलिए अब कानूनी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बोर्ड में कितने वोट पड़े, बल्कि यह भी है कि विशेष मतदान शर्त और कास्टिंग वोट का आपस में संबंध क्या है।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल विवाद का अंतिम कानूनी समाधान नहीं हुआ है। टाटा ट्रस्ट्स ने बोर्ड के फैसले पर आपत्ति जताई है और इसकी वैधता को चुनौती देने की संभावना जताई है। ऐसे में आगे कंपनी के Articles of Association की व्याख्या और संबंधित कानूनी प्रावधान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।