FATEHPUR NEWS: करीब 24 वर्ष पुराने हत्या के प्रयास के मामले में जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुधीर कुमार-वी की अदालत ने आरोपी राशिद हुसैन की जमानत अर्जी स्वीकार कर ली। न्यायालय ने वरिष्ठ अधिवक्ता जावेद खान के तर्कों को सुनते हुए और आधार पर गौरो फिक्र करते हुए एक लाख रुपये के निजी मुचलके एवं समान धनराशि की दो विश्वसनीय जमानतें दाखिल करने पर आरोपी को रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत आदेश मामले के गुण-दोष पर अंतिम टिप्पणी नहीं है और मुकदमे की सुनवाई पूर्ववत जारी रहेगी। मामला थाना थरियांव क्षेत्र के ग्राम बेती सादात निवासी राशिद हुसैन से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार वर्ष 2004 में धारा 307 भारतीय दंड संहिता (हत्या के प्रयास) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। आरोप था कि खेत जाते समय वादी पर गोली चलाई गई थी, जिससे वह घायल हो गया। विवेचना के बाद पुलिस ने राशिद हुसैन के विरुद्ध आरोपपत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया था। जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान वरिष्ठ विद्वान अधिवक्ता जावेद खान ने बचाव पक्ष की ओर से विस्तृत दलीलें पेश कीं। उन्होंने न्यायालय को बताया कि राशिद हुसैन का नाम मूल एफआईआर में कहीं भी दर्ज नहीं था। उनका कहना था कि विवेचना के दौरान पुलिस ने नामजद आरोपियों को बाहर कर उनके मुवक्किल को मामले में शामिल कर दिया, जबकि उसके विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि घायल, वादी अथवा किसी प्रत्यक्षदर्शी गवाह ने अपने बयान में राशिद हुसैन पर गोली चलाने का आरोप नहीं लगाया है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने न्यायालय को यह भी अवगत कराया कि इसी घटना से जुड़े क्रॉस केस में भी राशिद हुसैन को आरोपी बनाया गया था, लेकिन विधिवत विचारण के बाद न्यायालय ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया था। उनका कहना था कि एक ही घटना के मूल मुकदमे और क्रॉस केस दोनों में किसी व्यक्ति को आरोपी बनाए जाने से मामले की परिस्थितियों पर संदेह उत्पन्न होता है। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि मामले में आरोपी से कोई बरामदगी नहीं हुई है। चिकित्सीय साक्ष्य भी अभियोजन की कहानी का पूरी तरह समर्थन नहीं करते और राशिद हुसैन का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। उन्होंने अदालत से इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए जमानत देने की मांग की। वहीं जिला शासकीय अधिवक्ता ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि विवेचना के दौरान आरोपी की संलिप्तता सामने आई थी, जिसके आधार पर उसके विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया गया। उन्होंने यह भी बताया कि आरोपी की अनुपस्थिति के कारण पूर्व में उसके विरुद्ध गैर-जमानती वारंट भी जारी किया गया था, इसलिए उसे जमानत नहीं दी जानी चाहिए। दोनों पक्षों की दलीलों, केस डायरी तथा उपलब्ध अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुधीर कुमार-वी ने पाया कि आरोपी का नाम मूल एफआईआर में दर्ज नहीं है और उसके विरुद्ध कोई आपराधिक इतिहास भी प्रस्तुत नहीं किया गया है। न्यायालय ने उपलब्ध परिस्थितियों को देखते हुए माना कि आरोपी को जमानत दिए जाने का पर्याप्त आधार मौजूद है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी एक लाख रुपये के निजी बंधपत्र तथा समान धनराशि की दो विश्वसनीय जमानतें प्रस्तुत करने पर रिहा किया जाएगा। साथ ही यह भी निर्देश दिया कि वह मुकदमे की सुनवाई में पूरा सहयोग करेगा, प्रत्येक महत्वपूर्ण तिथि पर न्यायालय में उपस्थित रहेगा, किसी भी गवाह को प्रभावित करने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने का प्रयास नहीं करेगा। इन शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में उसकी जमानत निरस्त की जा सकती है।







