नहर की जमीन पर किसका राज? RTI में सफेद झूठ या भ्रष्टाचार का काला खेल
कागजों में गायब कर दिए कब्जे! सिंचाई विभाग के जवाब से उठी ‘सुविधा शुल्क’ की चर्चा
KUSHINAGAR NEWS: कहते हैं झूठ के पांव नहीं होते, लेकिन कुशीनगर के सिंचाई विभाग का झूठ तो नहर की पटरी पर बाकायदा दुकान खोलकर बैठा दिखाई दे रहा है। सरकारी विभागों में बैठे जिम्मेदार अधिकारी जनता को कितना गुमराह कर सकते हैं, इसकी एक बानगी जनसूचना जवाब में देखने को मिली है। सामाजिक सरोकारों से जुड़े अधिवक्ता देश दीपक मिश्रा द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में सिंचाई विभाग ने दावा किया है कि रोआरी रेगुलेटर से मुख्य पश्चिमी गण्डक नहर के किलोमीटर 81 तक “कोई अतिक्रमण व अवैध कब्जा नहीं है।” विभाग का यह दावा ऐसे समय में सामने आया है, जब नहर की पटरी पर वर्षों से गुमटियां,दुकानें और व्यावसायिक कब्जे खुलेआम संचालित हो रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर विभाग की नजर में अतिक्रमण व अवैध कब्जा की परिभाषा क्या है? जिस सरकारी भूमि पर स्थायी रूप से गुमटियां रखकर कारोबार किया जा रहा हो, जहां नहर की पटरी को निजी दुकानदारी का अड्डा बना दिया गया हो, वहां यदि विभाग को अतिक्रमण व कब्जा नहीं दिख रहा तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल है।
विभाग के पास नही है कोई दस्तावेज
सामाजिक मुद्दों को लेकर लगातार आवाज उठाने वाले अधिवक्ता देश दीपक मिश्रा ने जब नहर की भूमि, अतिक्रमण और सीमा निर्धारण से जुड़ी सूचनाएं मांगीं तो उम्मीद थी कि विभाग तथ्यात्मक जानकारी देगा। लेकिन विभाग का जवाब पढ़कर ऐसा लगता है कि कागजों में नहर की पूरी पटरी को अतिक्रमण मुक्त घोषित कर दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि विभाग ने यह भी कहा है कि सीमा निर्धारण से संबंधित अभिलेख अत्यंत पुराने हैं और उपलब्ध कराना संभव नहीं है। यदि विभाग के पास अपनी ही जमीन की स्पष्ट सीमाओं का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, तो फिर वह पूरे आत्मविश्वास के साथ यह कैसे दावा कर रहा है कि कहीं कोई अतिक्रमण नहीं है? यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब शायद खुद विभाग के पास भी नहीं होगा।
सुविधा शुल्क लेकर बने धृतराष्ट्र
स्थानीय लोगों का आरोप है कि नहर की पटरी पर कोई रातों-रात कब्जे नहीं हुए बल्कि वर्षों से नहर की पटरी पर गुमटियां रखी गई हैं और कारोबार चल रहा है। हर गुमटी, हर दुकान और हर कब्जे की कहानी विभागीय संरक्षण की तरफ इशारा करती है। चर्चा यह भी है कि सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों से मोटी रकम वसूली जाती है और उसके बाद विभाग के जिम्मेदार अफसर धृतराष्ट्र बन जाते हैं। फिर न पटरी दिखाई देती है, न अतिक्रमण और न ही सरकारी संपत्ति की लूट।स्थानीय लोगों का आरोप है कि नहर की पटरी पर कब्जा कोई नई बात नहीं हैं। चर्चा यह भी है कि इन कब्जों के पीछे विभागीय संरक्षण का खेल चलता है। आरोप लगते रहे हैं कि सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों से सुविधा शुल्क लेकर जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंद लेते हैं और फिर सरकारी रिकॉर्ड में सब कुछ सामान्य दिखा दिया जाता है।
निरीक्षक पर उठे सवाल
सबसे बड़ा सवाल उन निरीक्षण रिपोर्टों पर भी है, जिनका हवाला देकर विभाग कह रहा है कि पिछले पांच वर्षों में कोई प्रतिकूल स्थिति नहीं मिली। क्या निरीक्षण वास्तव में जमीन पर हुआ था या सिर्फ फाइलों में?क्योंकि जो कब्जे आम आदमी को दिखाई दे रहे हैं, वे अधिकारियों को क्यों नहीं दिखाई दिए?अधिवक्ता देश दीपक मिश्रा द्वारा उठाया गया यह मामला अब सिर्फ एक आरटीआई का विषय नहीं रह गया है। यह सरकारी भूमि की सुरक्षा, विभागीय पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही का मामला बन चुका है। यदि नहर की पटरी पर कब्जे नहीं हैं तो जिला प्रशासन मौके पर सर्वे कराकर सच्चाई सामने लाए। और यदि कब्जे हैं तो फिर आरटीआई में दी गई सूचना देने वाले अधिकारी के खिलाफ विभागीय व विधिक कार्यवाही सुनिश्चित की जानी चाहि।







