FATEHPUR NEWS: थाना सुल्तानपुर घोष क्षेत्र के ग्राम पंचायत बहेरा सादात में करबला के शहीदों की याद में हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के ताबूत पर अज़ीम मजलिस का आयोजन किया गया। मजलिस में क्षेत्र सहित दूर-दराज़ से आए बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने शिरकत कर शहीदान-ए-करबला को ख़िराज-ए-अकीदत पेश किया। पूरे गांव में ग़म, अकीदत और इमाम हुसैन (अ.स.) की याद का माहौल दिखाई दिया। झांसी से तशरीफ़ लाए मौलाना नावेद आब्दी ने मजलिस को ख़िताब करते हुए करबला के दर्दनाक वाक़िए को विस्तार से बयान किया। उन्होंने कहा कि लगभग 1400 वर्ष पूर्व करबला के तपते रेगिस्तान में हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने 72 वफ़ादार साथियों और अहलेबैत के साथ इस्लाम, इंसानियत और इंसाफ़ की रक्षा के लिए ऐसी महान क़ुर्बानी पेश की, जिसकी मिसाल इतिहास में नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि करबला का पैग़ाम हर दौर में हक़ और सच्चाई का साथ देना तथा ज़ुल्म और अत्याचार के सामने कभी सिर न झुकाना है। मौलाना ने कहा कि मोहर्रम केवल ग़म मनाने का महीना नहीं है, बल्कि यह इंसानियत, सेवा, त्याग, सब्र और भाईचारे का संदेश भी देता है। उन्होंने युवाओं से करबला के उसूलों को अपने जीवन में अपनाने और समाज में अमन, मोहब्बत एवं इंसाफ़ को बढ़ावा देने का आह्वान किया। मजलिस के समापन के बाद मस्जिद इमामिया से रसूल-ए-अकरम हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) के नवासे हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) का ताबूत पूरे एहतराम के साथ बरामद किया गया। “या हुसैन” और “लब्बैक या हुसैन” की सदाओं के बीच ताबूत अपने निर्धारित मार्ग से होकर नसीर हुसैन के बड़े इमामबाड़े पहुंचा, जहां बड़ी संख्या में मौजूद अज़ादारों ने ताबूत की ज़ियारत कर शहीदान-ए-करबला की बारगाह में पुरसा पेश किया। इस दौरान नौहाख़्वानी और मातम का सिलसिला भी जारी रहा, जिससे पूरा वातावरण ग़म और अकीदत से भर गया। कार्यक्रम के अंत में शहीदान-ए-करबला को ख़िराज-ए-अकीदत पेश करते हुए मुल्क में अमन, भाईचारे, खुशहाली और इंसानियत की सलामती के लिए विशेष दुआ की गई।







