MIRZAPUR NEWS: (अमरेश चंद्र पाण्डेय) जब सैकड़ों वर्षों का पुण्य संचित होता है तब एक बार मनुष्य जीवन मिलता है। ‘बड़े भाग मानुष तन पावा’ इसीलिये कहा गया है। मनुष्य योनि में आने के लिये देवता भी तरसते हैं। क्योंकि संसार में मनुष्य योनि ही कर्म करने के लिये बनी है, शेष समस्त योनियां उनके किये गये कार्यों व कर्मों के आधार पर सिर्फ भोग के लिये बनी हैं। देवता लोग भी अटके हुए हैं। थोड़ा अच्छा देवत्व वाला कर्म किये तो देवलोक के सुख भोग रहे हैं। वे अभी जन्म-मरण के बंधन से मुक्त नहीं हुये हैं। मुक्त होने के लिये उन्हें भी मनुष्य योनि में एक बार भगवत प्राप्ति का अवसर प्राप्त होगा, मुक्त होना न होना उनके कर्मों के अधीन होगा। मनुष्य योनि प्राप्त होने के गूढ़ विषय पर कैलहट स्थित सिद्ध हनुमान गढ़ी आश्रम के महंत परम वैरागी संत प्रणव-चैतन्य महाराज आश्रम में भक्तों के बीच अपने उपरोक्त हृदयोद्गार व्यक्त कर रहे थे। उनसे यह पूछे जाने पर कि वास्तव में सत्य है क्या? और मनुष्य उस सत्य को कैसे पहचाने? इस पर महाराज ने कहा, मनुष्य पूरा जीवन बिता देता है। सत्य यही है कि वह अंत तक जान नहीं पाता कि उसे इतना दुर्लभ मनुष्य जन्म क्यों मिला था। जिस दिन मनुष्य उसे जान जायेगा, सत्य सामने खड़ा मिलेगा। उन्होंने कहा, सत्य यही है कि मनुष्य को मानव जन्म सिर्फ और सिर्फ दो चीजों के लिये मिला है, तीसरा कोई हेतु नहीं है। एक तो प्रारब्ध का भोग भोगने के लिये, दूसरा नवीन सुकर्म व सुधर्म करके जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होने के लिये। लेकिन दुर्भाग्य है कि यहां आकर लोग भटक जाते हैं। किसी ने छल से बिना पैसे के किसी की सैकड़ों बीघा जमीन लिखवा ली, किसी ने कोठी, बंगला, कार सहित अरबों की संपदा खड़ी कर दी। ऐसे लोग अपने को समझते हैं कि उन्होंने अपनी सात पुश्तों के लिये बना दिया है। उन्होंने बहुत प्रगति की। धरती पर उनका मनुष्य जीवन काफी सफल रहा। वे कहते हैं, इतना कुछ करने में कितनों का खून-पसीना चूसा गया होगा। कितनों की आंखों में धूल झोंकी गई होगी, कितनों की पीठ में छुरा घोंपा होगा, तब जाकर इतना आडंबर खड़ा कर पाया होगा। जिसके लिये मनुष्य तन मिला, उस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा, यही मनुष्य का भटकाव है।







