JHANSI NEWS: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय बाकी है, लेकिन समाजवादी पार्टी में टिकट की राजनीति ने अभी से जोर पकड़ लिया है। जिले से लेकर विधानसभा स्तर तक कई नेता खुद को “भावी विधायक” के रूप में स्थापित करने की होड़ में लगे हैं। कोई बड़े-बड़े होर्डिंग लगवा रहा है, कोई सोशल मीडिया पर अपनी लोकप्रियता का दावा कर रहा है, तो कोई हर सार्वजनिक कार्यक्रम में सबसे आगे दिखाई देने की कोशिश कर रहा है। ऐसा माहौल बन गया है कि मानो चुनाव की घोषणा हो चुकी हो और टिकट भी तय हो गए हों। लेकिन दूसरी ओर पार्टी के भीतर का माहौल बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है। संगठन को मजबूत करने के बजाय कई स्थानों पर नेताओं की ऊर्जा अपने ही साथियों को कमजोर करने में खर्च होती दिखाई देती है। हर विधानसभा में अलग-अलग गुट सक्रिय हैं। एक नेता दूसरे को आगे बढ़ता नहीं देखना चाहता, जबकि कार्यकर्ता भी गुटों में बंटते नजर आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब पार्टी के भीतर ही एकजुटता नहीं है, तो जनता के बीच एक मजबूत विकल्प बनने का दावा कितना प्रभावी होगा? राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि कुछ नेताओं की राजनीति अब जनता के बीच कम और मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादा दिखाई देती है। सुबह से रात तक फेसबुक पोस्ट, इंस्टाग्राम रील, व्हाट्सएप स्टेटस और फोटो अभियान चलते रहते हैं। किसी के पैर छूने की तस्वीर, कहीं माल्यार्पण, कहीं स्वागत—हर गतिविधि कैमरे के लिए कैद होती है। लेकिन जनता यह भी पूछ रही है कि क्षेत्र की सड़क, बिजली, पानी, रोजगार और किसानों की समस्याओं पर कितनी गंभीर लड़ाई लड़ी गई? पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं का भी मानना है कि वर्षों तक संगठन को खड़ा करने वाले कार्यकर्ता आज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। मेहनत करने वालों की जगह प्रचार करने वाले चेहरे ज्यादा चर्चा में हैं। इससे जमीनी कार्यकर्ताओं का उत्साह प्रभावित होना स्वाभाविक है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव केवल सोशल मीडिया, पोस्टर और भीड़ जुटाने से नहीं जीते जाते। चुनाव बूथ जीतने से जीते जाते हैं, और बूथ वही जीतता है जहां कार्यकर्ता एकजुट होकर काम करता है। यदि संगठन के भीतर ही खींचतान और गुटबाजी जारी रही, तो सत्ता के सपने और विधायक बनने की महत्वाकांक्षाएं केवल नारों तक सीमित रह सकती हैं। क्या समाजवादी पार्टी के नेता पहले संगठन को मजबूत करेंगे या 2027 तक केवल विधायक बनने की दौड़ ही चलती रहेगी? क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब दल के भीतर की लड़ाई खत्म नहीं होती, तो चुनाव में विरोधियों से पहले नुकसान अपना ही होता है।







