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वफ़ा के अलमदार मौला अब्बास की याद में निकाला गया अलम का जुलूस

MIRZAPUR NEWS: (शाहिद वारसी)  दो मोहर्रम नौचंदी जुमेरात के मौके पर गैबीघाट स्थित जैगम अली के निवास से हजरत अब्बास अलैहिस्सलाम की याद में अलम का जुलूस निकाला गया। जुलूस से पहले मजलिस का आयोजन हुआ, जिसमें शहीदान-ए-कर्बला की कुर्बानियों का जिक्र किया गया। मजलिस के समापन के बाद अलम का जुलूस बड़े एहतराम के साथ रवाना हुआ। जुलूस में शामिल अजादार रास्ते भर नौहाख्वानी और सिनाजनी करते हुए चल रहे थे। या हुसैन और या अब्बास की सदाओं से माहौल गूंज उठा। जुलूस अपने पारंपरिक मार्गों से होता हुआ इमामबाड़ा स्थित कर्बला पहुंचा, जहां अकीदतमंदों ने जियारत की और शहीदान-ए-कर्बला को खिराज-ए-अकीदत पेश किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में लोग कर्बला में मौजूद रहे। सैय्यद तनवीर रज़ा ने बताया कि हजरत अब्बास अलैहिस्सलाम हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के भाई थे, जिन्हें सक्का-ए-कर्बला भी कहा जाता है। उनकी शहादत का जिक्र आज भी अजादारों की आंखें नम कर देता है। रिवायतों के मुताबिक, जब कर्बला में बच्चों की प्यास हद से बढ़ गई और खेमों से अल-अतश, अल-अतश (प्यास, प्यास) की सदाएं आने लगीं। तब मौला अब्बास अलैहिस्सलाम मश्क लेकर दरिया-ए-फुरात की तरफ रवाना हुए थे। मौला अब्बास ने फरात से पानी भर लिया था, लेकिन बच्चों की प्यास बुझाने की फिक्र में खुद पानी नहीं पिया। वापसी के दौरान यजीदियों ने हमला कर दिया। उनके दोनों बाजू काट दिए गए और मश्क भी छेद दी गई। आखिरकार हजरत अब्बास अलैहिस्सलाम शहीद हो गए। नफीसुल रिज़वी ने बताया कि 28 रजब 60 हिजरी को हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का काफिला मदीना से रवाना हुआ था और दो मोहर्रम 61 हिजरी को कर्बला पहुंचा। काफिला-ए-हुसैनी कर्बला की रेत पर उतरा। मौला हुसैन ने सरजमीं का नाम पूछा तो किसी ने कहा नैनवा, किसी ने कहा शातिये फुरात। फिर एक बूढ़ा आगे बढ़ा और बोला कि मौला इसे कर्बला भी कहते हैं। कर्बला का नाम सुनते ही मौला हुसैन की आंखें भर आईं। उन्होंने मिट्टी उठाकर उसे सूंघा और आसमान की तरफ देखकर फरमाया कि यही वह जगह है जहां हमारे खेमे लगेंगे। यही वह जगह है जहां हमारा लहू बहाया जाएगा। यह सुनकर बीबी जैनब सलामुल्लाह अलैहा का दिल कांप उठा। बीबी उम्मे कुलसूम बेचैन हो गईं। चार साल की मासूम बच्ची बीबी सकीना कुछ समझ न सकीं। कौन जानता था कि यहीं अली अकबर की जवानी लुटेगी, यहीं कासिम का जनाजा उठेगा, यहीं अब्बास के बाजू कटेंगे, यहीं छह माह के मासूम बच्चे अली असगर के गले पर तीर चलेगा और यहीं इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की चार साल की मासूम बच्ची बीबी सकीना अल-अतश, अल-अतश (प्यास, प्यास) पुकारेंगी। इस आशय की जानकारी शाहिद वारसी ने दी।