लेखक:रामनरेश प्रजापति, पत्रकार, गोल्ड मेडलिस्ट-जनसंचार एवं पत्रकारिता वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर उत्तर-प्रदेश

लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की असली शक्ति इस बात में निहित होती है कि सत्ता और विपक्ष—दोनों को समान सम्मान और अधिकार मिले। सरकारें बहुमत से बनती हैं, लेकिन शासन पूरे समाज और पूरे प्रदेश का होता है। ऐसे में यदि विकास योजनाओं, बजट आवंटन और सरकारी संसाधनों का वितरण राजनीतिक निष्ठा के आधार पर होने लगे, तो यह केवल विपक्ष के साथ अन्याय नहीं बल्कि जनता के जनादेश और संविधान की भावना का भी अपमान है। मछलीशहर की सपा विधायक डॉ. रागिनी सोनकर द्वारा उठाया गया प्रश्न इसी लोकतांत्रिक चिंता को सामने लाता है। उनका आरोप है कि सदन में जनहित के मुद्दे उठाने, सरकार की नीतियों पर सवाल करने और क्षेत्रीय समस्याओं को मुखरता से रखने के कारण उनके विधानसभा क्षेत्र को अपेक्षित विकास बजट नहीं मिल रहा। यदि ऐसा है, तो यह स्थिति बेहद गंभीर और चिंताजनक है। यह समझना होगा कि विधायक या सांसद केवल किसी दल का प्रतिनिधि नहीं होता, वह लाखों जनता की आशाओं और अधिकारों का प्रतिनिधि होता है। जनता मतदान करते समय यह नहीं सोचती कि उसका क्षेत्र विकास से वंचित रहेगा यदि उसका चुना हुआ प्रतिनिधि विपक्ष में बैठा। लोकतंत्र में जनता का मत समान होता है, फिर विकास के अधिकार में असमानता क्यों? यदि कोई विपक्षी जनप्रतिनिधि सदन में महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था, बलात्कार, प्रशासनिक तानाशाही या सरकारी नीतियों की विफलताओं पर सवाल उठाता है, तो यह उसका संवैधानिक दायित्व है, अपराध नहीं। विपक्ष की आवाज़ लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। लेकिन यदि सरकारें आलोचना को विरोध नहीं बल्कि “दंड” की तरह देखने लगें और उसका असर बजट आवंटन पर दिखाई देने लगे, तो इसका खामियाजा निर्दोष जनता को भुगतना पड़ता है। सबसे बड़ा प्रश्न यही है—जनता ने आखिर क्या गलती की है? क्यों किसी गांव की सड़क इसलिए अधूरी रह जाए कि उसका विधायक विपक्ष में है? क्यों किसी क्षेत्र का अस्पताल संसाधनों के अभाव में जूझे क्योंकि वहां का सांसद सरकार की आलोचना करता है? क्यों युवाओं को रोजगार, किसानों को सिंचाई और गरीबों को स्वास्थ्य सुविधाओं से इसलिए वंचित होना पड़े कि उनका जनप्रतिनिधि सत्ता पक्ष का नहीं है? यह लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ है। विकास किसी दल की जागीर नहीं हो सकता। सड़क, अस्पताल, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सुविधाएं नागरिकों का अधिकार हैं, राजनीतिक पुरस्कार नहीं। सरकार का दायित्व है कि वह हर क्षेत्र को उसकी आबादी, आवश्यकता और समस्याओं के आधार पर पर्याप्त बजट दे, न कि राजनीतिक नजदीकी या विरोध के आधार पर। डॉ. रागिनी सोनकर ने स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जो बातें कही हैं, वे केवल राजनीतिक बयान नहीं बल्कि जमीनी सच्चाई को दर्शाती हैं। आज भी ग्रामीण भारत का बड़ा हिस्सा बेहतर चिकित्सा सुविधाओं से वंचित है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की कमी, जिला अस्पतालों में आधुनिक जांच सुविधाओं का अभाव और विशेषज्ञ चिकित्सकों की अनुपलब्धता लाखों लोगों के लिए पीड़ा का कारण बनी हुई है। हर 30 किलोमीटर पर गुणवत्तापूर्ण उपचार की व्यवस्था, जिला स्तर पर एमआरआई और पेट स्कैन जैसी सुविधाएं तथा रेडियोलॉजिस्ट, नेफ्रोलॉजिस्ट, न्यूरोलॉजिस्ट जैसे विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता अब विलासिता नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुकी है। यदि इन मुद्दों को विपक्ष उठाता है, तो सरकार को उन्हें राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय नीतिगत सुझाव के रूप में स्वीकार करना चाहिए। आर्थिक मोर्चे पर भी हालात कम चिंताजनक नहीं हैं। महंगाई, बेरोजगारी और पारंपरिक उद्योगों का संकट आज आम नागरिक की सबसे बड़ी समस्या बन चुका है। बनारस के बुनकरों और भदोही के कारीगरों का पलायन केवल आर्थिक विफलता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत पर भी चोट है। यदि स्थानीय उद्योग कमजोर होंगे, तो रोजगार के अवसर भी सिकुड़ेंगे और सामाजिक असंतोष बढ़ेगा। इसी प्रकार भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और अवसरों की समानता भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल आधार है। यदि युवाओं को लगे कि अवसर भी राजनीतिक प्रभाव से तय हो रहे हैं, तो व्यवस्था के प्रति विश्वास कमजोर होगा। मीडिया और लोकतंत्र पर भी गंभीर बहस की आवश्यकता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र वही है, जहां हर वर्ग, हर विचार और हर आवाज़ को मंच मिले। असहमति को दबाने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करती है। दरअसल, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की परिपक्वता इस बात से तय होती है कि वह अपने विरोध को कितना सम्मान देती है। सत्ता पक्ष यदि केवल प्रशंसा सुनना चाहता है और आलोचना को शत्रुता मानने लगे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे औपचारिकता बन जाता है। सरकारों को यह समझना होगा कि विपक्ष का मजबूत होना लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं बल्कि सुरक्षा कवच है। विपक्ष जनता की समस्याओं को सामने लाता है, सत्ता को जवाबदेह बनाता है और नीतियों की खामियों की ओर ध्यान दिलाता है। यदि इस भूमिका को कमजोर करने के लिए विकास बजट का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह न केवल संविधान की भावना के खिलाफ है बल्कि जनता के मताधिकार और जनादेश का भी अपमान है। लोकतंत्र की असली पहचान यही है कि सत्ता और विपक्ष दोनों के क्षेत्रों में समान विकास हो, हर नागरिक को बराबरी का अधिकार मिले और जनता की समस्याओं को उठाने वाले जनप्रतिनिधियों को दंडित नहीं बल्कि सुना जाए। विकास का पैमाना राजनीतिक निष्ठा नहीं, जनता की जरूरत होनी चाहिए।







