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जहाँ गूंजती है रानी की गाथा, वहाँ सरकारी कार्यालयों से उनकी तस्वीरों का अभाव

रानी लक्ष्मी बाई का नाम हर मंच पर, लेकिन सरकारी दफ्तरों में तस्वीर तक नहीं—यह कैसी विडंबना?
JHANSI NEWS:  झाँसी केवल एक शहर नहीं, बल्कि भारत के स्वाभिमान, साहस और बलिदान की जीवंत पहचान है। यह वही भूमि है जहाँ से रानी लक्ष्मी बाई ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजी हुकूमत को ललकारा था। उनका नाम आज भी देश-विदेश में वीरता के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस शहर की पहचान उनके नाम से है, वहीं आज उनके सम्मान को लेकर संवेदनशीलता का अभाव साफ नजर आता है। सरकारी कार्यालय किसी भी समाज की प्रशासनिक आत्मा होते हैं। यही वह स्थान हैं जहाँ से शासन की नीतियाँ और संस्कार दोनों परिलक्षित होते हैं। ऐसे में इन कार्यालयों में राष्ट्रनायकों और महान विभूतियों के चित्र केवल औपचारिक सजावट नहीं, बल्कि एक संदेश होते हैं—एक प्रेरणा, एक स्मरण कि हम किस विरासत के उत्तराधिकारी हैं। झाँसी के अनेक सरकारी दफ्तरों में रानी लक्ष्मी बाई का चित्र न होना महज एक छोटी चूक नहीं, बल्कि यह उस मानसिकता का संकेत है जिसमें हम अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। यह स्थिति तब और अधिक चिंताजनक हो जाती है जब हम देखते हैं कि औपचारिकता के नाम पर अन्य चित्र तो लगाए जाते हैं, लेकिन झाँसी की आत्मा कही जाने वाली रानी लक्ष्मी बाई को ही भुला दिया जाता है। यह प्रश्न केवल एक तस्वीर का नहीं है, बल्कि यह हमारे सामूहिक स्मृति और सम्मान का प्रश्न है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देना चाहते हैं कि जिन वीरों ने देश के लिए प्राण न्यौछावर किए, उनका स्थान हमारे सार्वजनिक जीवन में गौण है? सम्पादकीय दृष्टि से यह आवश्यक है कि प्रशासन इस विषय को गंभीरता से ले। सभी सरकारी कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक स्थलों पर रानी लक्ष्मी बाई के चित्र अनिवार्य रूप से स्थापित किए जाने चाहिए। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर इतिहास और विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाने के प्रयास भी किए जाने चाहिए। यह केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग का दायित्व है कि वह अपनी पहचान और गौरव को संजोए। झाँसी को यदि सच में अपनी ऐतिहासिक गरिमा बनाए रखनी है, तो उसे अपने अतीत का सम्मान वर्तमान में सुनिश्चित करना होगा।
अंततः, यह समय है आत्ममंथन का—क्या हम केवल रानी लक्ष्मी बाई के नाम का उपयोग अपनी पहचान के लिए करना चाहते हैं, या वास्तव में उनके आदर्शों और सम्मान को अपने जीवन और व्यवस्था में स्थान देना चाहते हैं? यही प्रश्न झाँसी के भविष्य की दिशा तय करेगा।