“वोट का अधिकार छीना तो संविधान का उल्लंघन!”
हैदराबाद। देश में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने मतदान के अधिकार को लेकर बेहद अहम टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत मिले मतदान के अधिकार से किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।
हैदराबाद स्थित NALSAR University of Law में आयोजित जस्टिस बोध राज साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसके कारण बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक अपने मतदान के अधिकार से वंचित हो जाएं, संविधान के विरुद्ध होगी।
उन्होंने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों या करोड़ों भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है और वे अपने ही देश में ऐसे नागरिक बन जाते हैं जिनके पास मतदान का अधिकार नहीं है, तो ऐसी प्रक्रिया अपने आप में मनमानी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि दूसरे मामलों का हवाला देकर ऐसी स्थिति को सही नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस भुइयां ने मताधिकार से वंचित किए जाने की तुलना बेहद गंभीर शब्दों में करते हुए कहा कि किसी भारतीय नागरिक से उसके मतदान का अधिकार छीनना “शरीर से आत्मा निकालने” जैसा होगा।
संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 का हवालाजस्टिस भुइयां ने संविधान के अनुच्छेद 325 का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक सामान्य मतदाता सूची होनी चाहिए। किसी व्यक्ति को केवल धर्म, नस्ल, जाति या लिंग के आधार पर मतदाता सूची में शामिल होने से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
वहीं अनुच्छेद 326 के तहत वयस्क मताधिकार की व्यवस्था का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र का भारतीय नागरिक, यदि संविधान या कानून के तहत किसी वैध आधार पर मतदान के लिए अयोग्य घोषित नहीं किया गया है, तो मतदाता के रूप में पंजीकरण का अधिकार रखता है।
SIR विवाद के बीच आई टिप्पणीजस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश के विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर विवाद चल रहा है और इस प्रक्रिया के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लंबित हैं।
विपक्षी दलों की ओर से आरोप लगाए गए हैं कि SIR की प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी नहीं आया है।
SIR को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर भी हाल में सवाल उठे हैं। एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच SIR से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर मतभेद रहे हैं।
लोकतंत्र की बुनियाद पर जोरजस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में डॉ. बी.आर. आंबेडकर का भी उल्लेख किया और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के महत्व पर प्रकाश डाला।
उनकी टिप्पणी का व्यापक संदेश यही रहा कि मतदान का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी ताकत है और ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिससे बड़ी संख्या में पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित हों, उसे संविधान की कसौटी पर परखा जाना जरूरी है।
हालांकि, जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी SIR पर कोई अंतिम फैसला नहीं है। SIR से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों, दस्तावेजों और कानूनी दलीलों के आधार पर आगे निर्णय लिया जाएगा।