अरबों से बगावत, यहूदियों से 'रक्त-संधि': जब Muslim-Jews ने मिलकर बनाया इजरायल, 1948 के युद्ध की अनसुनी कहानी
मुस्लिम कबायली सरदार ने यहूदी लड़ाकों से मिलाया हाथ, करीब 70 युवाओं ने लिया सैन्य प्रशिक्षण; अरब-इजरायल युद्ध की इतिहास में दर्ज है यह अनसुनी कहानी
नई दिल्ली। इजरायल और अरब देशों के बीच दशकों से जारी संघर्ष के इतिहास में एक ऐसा अध्याय भी है, जो आज की राजनीतिक और धार्मिक धारणाओं से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है। वर्ष 1948 में जब इजरायल के गठन को लेकर यहूदी और अरब समुदायों के बीच भीषण संघर्ष चल रहा था, उस समय कुछ मुस्लिम अरब कबीलों ने यहूदी लड़ाकों का साथ देने का फैसला किया था। इनमें उत्तरी इजरायल के गलील क्षेत्र का अल-हैब (Al-Haib) बेदुइन कबीला प्रमुख था। इस कबीले के मुस्लिम सरदार ने यहूदी नेतृत्व के साथ सहयोग का समझौता किया और अपने युवाओं को उनके साथ मिलकर लड़ने के लिए तैयार किया।
इतिहासकारों के अनुसार, वर्ष 1948 की शुरुआत में अल-हैब कबीले के प्रमुख शेख हुसैन इस्माइल अबू यूसुफ ने यहूदी सैन्य संगठन पामाच (Palmach) के कमांडर यिगाल अलोन से संपर्क किया था। उन्होंने प्रस्तावित यहूदी राज्य के साथ सहयोग की इच्छा जताई। इसके बाद कबीले के करीब 70 युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण दिया गया। इन लड़ाकों ने यहूदी सेनाओं को स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों, अरब समूहों की गतिविधियों और उनके ठिकानों की जानकारी देने में मदद की।
युद्ध में निभाई अहम भूमिका
अल-हैब कबीले के लड़ाकों की सबसे बड़ी ताकत गलील क्षेत्र के पहाड़ी इलाकों और स्थानीय रास्तों की जानकारी थी। उन्होंने यहूदी लड़ाकों को खुफिया सूचनाएं उपलब्ध कराईं और सैन्य अभियानों में सहयोग किया। यह फैसला उनके लिए आसान नहीं था, क्योंकि इसके चलते उन्हें अपने ही समुदाय के दूसरे अरब समूहों की नाराजगी का सामना करना पड़ा।
हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि उस दौर में सभी मुस्लिम बेदुइन कबीलों का रुख एक जैसा नहीं था। कुछ ने यहूदी सेनाओं का साथ दिया, कुछ फिलिस्तीनी अरब पक्ष के साथ लड़े, जबकि कई तटस्थ रहे। यानी 1948 का संघर्ष केवल धर्म के आधार पर बंटा हुआ नहीं था, बल्कि इसमें स्थानीय रिश्ते, कबायली हित और राजनीतिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण थीं।
14 मई 1948 को हुआ इजरायल का गठन
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद फिलिस्तीन के भविष्य को लेकर यहूदी और अरब समुदायों के बीच तनाव बढ़ता गया। 29 नवंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने फिलिस्तीन के विभाजन का प्रस्ताव पारित किया, जिसके तहत एक यहूदी और एक अरब राज्य बनाने की योजना थी। फिलिस्तीनी अरब नेतृत्व और अरब देशों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
14 मई 1948 को डेविड बेन गुरियन ने इजरायल की स्वतंत्रता की घोषणा की। इसके अगले ही दिन मिस्र, ट्रांसजॉर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक की सेनाएं युद्ध में शामिल हो गईं। इसके बाद संघर्ष व्यापक अरब-इजरायल युद्ध में बदल गया, जो 1949 तक चला।
धर्म से ऊपर थे स्थानीय रिश्ते और हित
अल-हैब कबीले की कहानी इस बात का उदाहरण है कि उस दौर में कुछ मुस्लिम अरबों ने यहूदी नेतृत्व के साथ सहयोग का रास्ता चुना था। यह सहयोग किसी एक धर्म या पूरे समुदाय की सामूहिक सहमति का परिणाम नहीं था, बल्कि कुछ स्थानीय कबायली नेताओं के अपने राजनीतिक और सामाजिक फैसलों से जुड़ा था।
इतिहासकार मुहम्मद यूसुफ सुवैद के शोध में भी गलील क्षेत्र के बेदुइन कबीलों और यहूदी समुदाय के बीच 1948 के युद्ध के दौरान सहयोग का उल्लेख मिलता है। इस इतिहास से स्पष्ट होता है कि मध्य पूर्व का संघर्ष केवल यहूदी बनाम मुस्लिम की सरल कहानी नहीं है। इसके पीछे राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं, क्षेत्रीय हित, स्थानीय दुश्मनियां और अस्तित्व की लड़ाई जैसे अनेक पहलू भी रहे हैं।