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वाराणसीय अदालत ने 29 साल पुराने मामले में दरोगा सहित डॉक्टर को भेजा जेल

VARANASI NEWS: वाराणसी की अदालत ने पुलिस कस्टडी (हिरासत) में मौत के 29 साल पुराने एक मामले में ऐतिहासिक और कठोर फैसला सुनाया है। अदालत ने फैसला सुनाते हुए तत्कालीन चैकी इंचार्ज (दरोगा) और एक एएसआई सहित मामले में दोषी पाए गए सभी पुलिसकर्मियों व डॉक्टर को जेल की सजा सुनाई है। अदालत ने कानून का उल्लंघन करने वाले दो दारोगाओं के साथ-साथ पुलिसिया बर्बरता पर पर्दा डालने वाले पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को भी दोषी करार देते हुए जेल भेज दिया है। अदालत ने तत्कालीन सुंदरपुर चैकी प्रभारी (इंचार्ज) को 10 साल के कठोर कारावास और थाने के तत्कालीन एएसआई को छह महीने की सजा सुनाई है। वहीं, खाकी के गुनाह को छुपाने के दोषी पाए गए डॉक्टर को पांच साल की सुनाई गई। अदालत ने सोमवार को प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डा. के के जैन, रिटायर्ड दारोगा नरेन्द्र प्रताप सिंह और राधेश्याम सिंह को दोषी करार दिया है। वही अदालत ने डा. के के जैन को पांच वर्ष के कारावास एवं 40 हजार रुपया जुर्माना, नरेंद्र प्रताप सिंह को दस साल कारावास एवं 31 हजार रुपया तथा राधेश्याम सिंह को छह माह कारावास एवं एक हजार रुपया जुर्माने की सजा दी है। दोषियों द्वारा जुर्माना देने पर अदालत ने 50 प्रतिशत धनराशि मृतक के परिजन को देने का आदेश दिया है. अदालत में अभियोजन पक्ष की ओर से ज्येष्ठ अभियोजन अधिकारी (सीबीसीआईडी) गंगाशरण ने पैरवी करते हुए मृतक की पत्नी समेत 12 गवाहों को परीक्षित कराए। अभियोजन पक्ष के अनुसार घटना पांच फरवरी 1997 की है. जंसा थाना क्षेत्र के बखरिया गांव का निवासी राजेंद्र प्रसाद सिंह अपने बेटे की दवा लेने वाराणसी आया था. ककरमता होते हुए महानगर बस से सुंदरपुर जा रहा था।
क्या है मामला:
बस में सीट को लेकर किसी यात्री से कहासुनी हो गई। उसी दौरान सुंदरपुर पुलिस चैकी पर तत्कालीन दारोगा नरेंद्र प्रताप सिंह मौजूद थे। राजेन्द्र को पकड़ कर पुलिस चैकी ले गए और उस पर आरोप लगाया कि यात्री दयाराम की जेब से सौ रुपया निकाल लिया है। बाद में, पुलिस की प्रताड़ना से चैकी पर उसी दिन शाम में राजेंद्र की मौत हो गई. मृत्यु के बाद दारोगा नरेंद्र प्रताप सिंह द्वारा मृतक के खिलाफ लंका थाना पर चोरी का मुकदमा दर्ज कराया गया। मानवाधिकार आयोग द्वारा संज्ञान लिए जाने पर इसकी जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी गई. सीबीसीआईडी के इंस्पेक्टर श्रीकांत पांडेय ने जांच के बाद थाना लंका 15 अप्रैल 1998 को प्रार्थना पत्र दिया और 22 अप्रैल को तत्कालीन थाना प्रभारी हसन अब्बास सहित 8 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। विवेचना के बाद 11 लोगों के खिलाफ दो अलग-अलग तिथियों पर अदालत में दाखिल की गई. मुकदमे की सुनवाई सात दिसंबर 2005 से अदालत में आरंभ हुई। इनमें से दो आरोपितों अपर नगर मजिस्ट्रेट अवध मणि त्रिपाठी व कविंद्र नारायण सिंह को आरोप निर्धारण के स्तर पर न्यायालय द्वारा उन्मोचित कर दिया गया। जबकि इंस्पेक्टर हसन अब्बास, कांस्टेबल शुभ नारायण सिंह, कांस्टेबल मंगरु पांडेय, कांस्टेबल चंद्रमा चैधरी की मृत्यु हो गई। शेष पांच आरोपितों डा.के के जैन, एसआई राधेश्याम सिंह, एसआई नरेंद्र प्रताप सिंह,कांस्टेबल श्रीनिवास शुक्ला और कांस्टेबल अनिरुद्ध यादव के खिलाफ मुकदमा की सुनवाई की गई। कांस्टेबल श्रीनिवास शुक्ला व अनिरुद्ध यादव को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त कर दिया गया। वहीं गवाहों के बयान और पत्रावली पर उपलब्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने डा. के के जैन, गोरखपुर जिला के हरपुर बुदहर थाना क्षेत्र के गिदहा निवासी सेवानिवृत्त दारोगा राधेश्याम सिंह और प्रयागराज जिला के हंडिया थाना क्षेत्र के रघूपुर गांव के निवासी नरेंद्र प्रताप सिंह को दोषी पाया।