प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा को आनंदमय और गतिविधि आधारित बनाने पर जोर
KAUSHAMBI NEWS: जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) कौशाम्बी में शनिवार को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत ‘ECCE एडुकेटर उन्मुखीकरण 2026’ कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। प्रशिक्षण में परिषदीय विद्यालयों व आंगनबाड़ी केंद्रों में अध्ययनरत नौनिहालों को गतिविधि आधारित, भयमुक्त और आनंददायक शिक्षा उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया गया। प्रशिक्षण के दौरान बाल विकास, भाषा कौशल, सामाजिक व्यवहार और रचनात्मक गतिविधियों को लेकर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम का उद्घाटन डायट प्राचार्या निधि शुक्ला ने दीप प्रज्वलित कर किया। उन्होंने कहा कि बाल्यकाल जीवन की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था होती है। इस दौरान दिए गए संस्कार और शिक्षा बच्चों के भविष्य की मजबूत नींव तैयार करते हैं। उन्होंने कहा कि ECCE शिक्षक बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं। बच्चों को प्रारंभिक अवस्था में सकारात्मक वातावरण और स्नेहपूर्ण शिक्षा मिलने से उनमें आत्मविश्वास और सीखने की रुचि विकसित होती है।
मुख्य अतिथि डॉ. कमलेंद्र कुमार कुशवाहा ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि बच्चों की रचनात्मकता और अंतर्मन को जागृत करना है। उन्होंने कहा कि शिक्षक जब किसी बालक का हाथ थामता है तो वह भविष्य को दिशा देने का कार्य करता है। उन्होंने शिक्षकों से बच्चों की जिज्ञासा और कल्पनाशक्ति को बढ़ावा देने की अपील की। प्रशिक्षण समन्वयक धर्मनाथ ने बताया कि कार्यशाला का उद्देश्य एडुकेटर्स को आधुनिक शिक्षण तकनीकों व गतिविधि आधारित शिक्षण पद्धति से जोड़ना है। इससे विद्यालयों और आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों के लिए बेहतर शिक्षण वातावरण तैयार होगा। उन्होंने कहा कि खेल-खेल में शिक्षा देने की पद्धति बच्चों को सीखने के प्रति आकर्षित करती है। कार्यशाला में मुख्य संदर्भदाता धीरज कुमार व डॉ. ओमप्रकाश सिंह ने बाल मनोविज्ञान, खेल आधारित शिक्षण, भाषा विकास और रचनात्मक गतिविधियों पर विस्तार से जानकारी दी। डॉ. ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा बच्चों के संपूर्ण विकास की आधारशिला है। इस अवस्था में बच्चों को खेल, कहानी, चित्र और गतिविधियों के माध्यम से सीखने का अवसर देना सबसे प्रभावी तरीका है। उन्होंने कहा कि यदि बच्चों को भयमुक्त और उत्साहपूर्ण वातावरण मिले तो उनकी रचनात्मक क्षमता स्वतः विकसित होती है। साथ ही एडुकेटर्स से बच्चों की जिज्ञासा को समझते हुए उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करने का आह्वान किया। वक्ताओं ने कहा कि खेल बच्चों की सहज अभिव्यक्ति का सबसे प्रभावी माध्यम है और इससे बच्चों में सामाजिक व्यवहार, सहयोग की भावना और आत्मविश्वास विकसित होता है। प्रशिक्षण में दैनिक जीवनचर्या के सात चरणों — गुड मॉर्निंग सर्कल, स्वतंत्र खेल, भाषा साक्षरता, कला गतिविधियां, गणितीय सोच, बाहरी खेल और गुड इवनिंग सर्कल — पर विस्तार से चर्चा की गई। इसके अलावा कला कोना, किताब कोना, ब्लॉक कोना और अभिनय कोना के माध्यम से गतिविधि आधारित शिक्षण की उपयोगिता समझाई गई। प्रशिक्षण के दौरान शिक्षकों को टीएलएम सामग्री के उपयोग, कहानी सुनाने की विधि तथा बच्चों की सहभागिता बढ़ाने के उपायों का भी व्यावहारिक अभ्यास कराया गया। इस दौरान प्रेरक नारों और गीतों से पूरा परिसर गुंजायमान रहा। प्रशिक्षुओं ने समूह गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अंत में सभी एडुकेटर्स ने बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और आनंदमय शिक्षा उपलब्ध कराने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में शिक्षक, संदर्भदाता, प्रशिक्षु एवं शिक्षा विभाग के कर्मचारी उपस्थित रहे।



