मंगलवार को नामांकन के दिन कपिलवस्तु जिले के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में लोकतंत्र का उत्सव देखते ही बना। ढोल-नगाड़ों की थाप, गगनभेदी नारों और समर्थकों के भारी हुजूम के साथ प्रमुख दलों के प्रत्याशियों ने निर्वाचन आयोग के कार्यालयों तक पहुँचकर अपना-अपना पर्चा दाखिल किया। शक्ति प्रदर्शन के इस दौर में झंडे-बैनरों से सजी सड़कों पर चुनावी रंग पूरी तरह से चढ़ चुका है।
बढ़नी (सिद्धार्थनगर)। पड़ोसी मित्र राष्ट्र नेपाल की राजनीति इन दिनों तेज़ सियासी उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। आगामी संसदीय चुनाव की दहलीज पर खड़े नेपाल में सांसद बनने की ऐसी होड़ मची है कि कई दिग्गज नेताओं ने अपनी दशकों पुरानी विचारधारा को छोड़कर रातों-रात दूसरी पार्टियों का दामन थाम लिया है। सत्ता की चाहत और टिकट की जुगत में हुए इस पाला-बदल ने सीमावर्ती क्षेत्रों के सियासी पारे को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है।
मंगलवार को नामांकन के दिन कपिलवस्तु जिले के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में लोकतंत्र का उत्सव देखते ही बना। ढोल-नगाड़ों की थाप, गगनभेदी नारों और समर्थकों के भारी हुजूम के साथ प्रमुख दलों के प्रत्याशियों ने निर्वाचन आयोग के कार्यालयों तक पहुँचकर अपना-अपना पर्चा दाखिल किया। शक्ति प्रदर्शन के इस दौर में झंडे-बैनरों से सजी सड़कों पर चुनावी रंग पूरी तरह से चढ़ चुका है।
इस बार का चुनाव सिर्फ चेहरों की जंग नहीं, बल्कि बेरोजगारी, महंगाई, बुनियादी विकास और भ्रष्टाचार जैसे सुलगते मुद्दों का असली इम्तिहान है। जनता के बीच इस बात को लेकर गहरी चर्चा है कि बार-बार दल बदलने वाले नेता वास्तव में जनहित के लिए प्रतिबद्ध हैं या फिर यह सिर्फ सत्ता की मलाई चखने की राजनीति है। अब सारी नज़रें नेपाल की जागरूक जनता पर टिकी हैं, जिसे यह तय करना है कि वे दलबदलू दिग्गजों पर भरोसा करेंगे या फिर किसी नए और स्थिर नेतृत्व को चुनकर संसद भेजेंगे। नामांकन के साथ ही चुनावी रणभूमि तैयार है और जनता का फैसला ही नेपाल के भविष्य की नई इबारत लिखेगा।







