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क्या जौनपुर में मौत के सौदागर खुलेआम कर रहे हैं इलाज ? जब बेसमेंट बना हॉस्पिटल और लापरवाही बनी व्यवस्था की पहचान ?

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क्या आपने कभी सोचा है कि जिस अस्पताल में आप इलाज करवाने जाते हैं, वही आपकी जिंदगी छीन सकता है? क्या आपने कल्पना की है कि अस्पताल के नाम पर चल रहे कुछ बेसमेंट वास्तव में मौत के अड्डे बन चुके हैं? और सबसे बड़ा सवाल कृ क्या जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे ये सब कुछ अनजाने में हो रहा है या सबकी मिलीभगत से ?

प्रातःकाल एक्सप्रेस
जौनपुर ब्यूरो 09 नवम्बर। जौनपुर जिले में ये सारे सवाल अब सिर्फ चर्चाओं तक सीमित नहीं रहे, बल्कि हकीकत का चेहरा बन चुके हैं। शहर और कस्बों में कई ऐसे तथाकथित हॉस्पिटल चल रहे हैं जो न तो स्वास्थ्य विभाग में रजिस्टर्ड हैं, न उनके पास मेडिकल लाइसेंस है, और न ही प्रशिक्षित डॉक्टर। फिर भी इलाज चल रहा है कृ इंजेक्शन दिए जा रहे हैं, ऑपरेशन किए जा रहे हैं, और लोगों की जिंदगियाँ रिस्क पर डाली जा रही हैं।
सरकारी रिकॉर्ड में साफ लिखा है कि बिना लाइसेंस कोई भी क्लीनिक या हॉस्पिटल नहीं चल सकता, लेकिन जौनपुर में नियमों की किताब सिर्फ दिखावे के लिए रखी गई लगती है।

स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे चल रहा ‘बेसमेंट हॉस्पिटल’, लेकिन आंखें बंद हैं?
सूत्रों के अनुसार, सीएमओ के आदेशों के बावजूद जिले में कई अस्पताल बिना किसी मानक की पूर्ति किए खुलेआम चल रहे हैं। सबसे चैंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कुछ हॉस्पिटल तो बेसमेंट में चल रहे हैं.

2 नंद हॉस्पिटल (कुत्तूपुर बाईपास, शाहगंज रोड)और 3 भारत चिल्ड्रेन हॉस्पिटल (बदलापुर ) ऐसे में सवाल यह उठना लाजमी है ? क्या स्वास्थ्य विभाग भी इस अपराध में बराबर का भागीदार है? क्या जान की कीमत अब सिर्फ एक कागज के लाइसेंस से भी सस्ती हो गई है?

जौनपुर का स्वास्थ्य विभाग अब सवालों के घेरे में है। एक ओर सीएमओ और सीएमएस लगातार “सिस्टम को मजबूत करने” की बात करते हैं, दूसरी ओर उनके जिले में बिना मानक और बिना अनुमति के हॉस्पिटल्स धड़ल्ले से चल रहे हैं।
ऐसा कैसे संभव है कि स्थानीय प्रशासन को इनकी भनक तक न लगे?
क्या स्वास्थ्य विभाग सिर्फ तब हरकत में आता है जब कोई मीडिया रिपोर्ट सामने आती है?
क्या आम नागरिक की सुरक्षा और जान की कीमत अब सिर्फ कागजी जांच तक सिमट गई है? जीवनदीप, नंद और भारत चिल्ड्रेन हॉस्पिटल जैसे नाम अब सिर्फ इलाज के नहीं, बल्कि लापरवाही और भ्रष्टाचार के प्रतीक बन चुके हैं।

स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी, लापरवाही नहीं, साझेदारी है?

हर कोई जानता है कि प्रशासनिक तंत्र में अगर कार्रवाई नहीं होती, तो इसका मतलब है कि कहीं न कहीं सांठगांठ जरूर है।
अगर कोई बेसमेंट हॉस्पिटल पुलिस बूथ के सामने सालों से चल रहा है, तो ये मान लेना गलत नहीं होगा कि अधिकारियों की चुप्पी भी एक किस्म की मौन स्वीकृति है।
स्वास्थ्य विभाग की ड्यूटी है कि वो जिले में चल रहे सभी निजी अस्पतालों की जांच करे, उनके लाइसेंस, डॉक्टरों की क्वालिफिकेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर की पुष्टि करे। लेकिन यहाँ न तो कोई नियमित जांच होती है और न ही किसी मानक का पालन।

ये खेल सिर्फ पैसों का नहीं कृ जिंदगियों का है।
हर दिन कोई न कोई मरीज अपनी मेहनत की कमाई इन अवैध अस्पतालों में झोंक देता है, उम्मीद करता है कि उसका इलाज होगा। लेकिन वहां इलाज नहीं, बल्कि लापरवाही का सौदा होता है।
और जब कोई हादसा होता है, तब अधिकारियों के बयान शुरू हो जाते हैं कृ “जांच की जाएगी”, “दोषियों पर कार्रवाई होगी”३ मगर हकीकत ये है कि जांच फाइलों में दबी रह जाती है, और मौतें सिलसिला बन जाती हैं।

अब वक्त है जवाब का कृ कब तक लापरवाही को सिस्टम कहा जाएगा? अब सवाल सिर्फ तीन हॉस्पिटल्स का नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम के गिर चुके मानकों का है। कितनी बार ऐसा होगा कि बेसमेंट में इलाज के नाम पर लोगों की जान जाती रहे और प्रशासन सिर्फ प्रेस नोट जारी करता रहे? कब तक जांच कमेटियाँ बनती रहेंगी और फिर उसी फाइल पर धूल जमती रहेगी?

अगर सच में सरकार और प्रशासन आम जनता की सेहत के लिए गंभीर है, तो अब जरूरत है दिखावटी नोटिसों नहीं, ठोस कार्रवाई की। जब बेसमेंट हॉस्पिटल मौत का सौदा करने लगें और स्वास्थ्य अधिकारी आंखें मूंद लें, तो समझ लीजिए
बीमार सिर्फ सिस्टम नहीं, इंसानियत भी हो चुकी है।