मन के भीतर तो,अक्सर वे बातें ही गुंजित है,
जिसमें कहीं हुआ निरादर,या कहीं वह निंदित है।
ध्यान दें जो इन बातों पर,वे मन तो कुंठित है,
इन बातों से जो करें उपेक्षा,वे मन ही तो पंडित है।
कहीं मन है नाखुश,तो कहीं पर मन रंजीत है,
कहीं मन है गतिशील,तो कहीं पर मन स्तंभित है।
मन कहीं पर है निशंक,तो कहीं पर मन शंकित है,
मन कहीं पर है अक्षुण्ण,तो कहीं पर मन खंडित है। मन चंचल है,मन चिंतित है, मन अर्धमग्न है,मन किंचित है। मन को कैसे समझाएं प्यारे, मन तो सत्य से वंचित है...
लेखक:-{आशीष कुमार सैनी}
पुराछात्र-इलाहाबाद विश्वविद्यालय
जनपद प्रयागराज,उत्तर प्रदेश।







