ईमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के 40वें दिन की याद में दुनिया का सबसे बड़ा पैदल कारवां
MIRZAPUR NEWS: मीरजापुर के सूफी मौलाना अबरार हुसैन वारसी साहब से एक खास मुलाकात के दौरान अल्लामा साहब ने बताया “कि दुनिया के नक़्शे पर एक जगह है जिसका नाम “कर्बला,, है। वहां की सरज़मीन पर जहां 1400 साल पहले हक़ और इंसाफ़ की ख़ातिर इमाम हुसैन अ.स ने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। उन्हीं की याद में हर साल अरबईन के मौक़े पर इंसानियत का सबसे बड़ा कारवां निकलता है। अरबईन, जिसे चेहल्लुम कहा जाता है”।
अरबईन के मौके पर नजफ़ से कर्बला तक 80 किलोमीटर लंबी पैदल यात्रा जारी है। यह यात्रा ईमाम हुसैन की शहादत के 40वें दिन की याद में की जाती है। हर साल करोड़ों जायरीन इस वॉक में हिस्सा लेते हैं। लेकिन जो चीज़ अरबईन को सबसे ख़ास बनाती है, वह है ख़िदमत का जज़्बा। यहां कोई अमीर-गरीब, बड़ा-छोटा, अरब-अजमी, काला-सफ़ेद नहीं देखा जाता। जो भी आता है, उसे मेहमान समझा जाता है और ज़ायरीन की खिदमत को इबादत समझते है।
सड़कों के किनारे नजफ़ से कर्बला तक दस्तरख़्वान बिछे होते हैं। जिसे दुनिया का सबसे बड़ा दस्तरख़्वान कहां जाता है कोई गरम-गरम चाय पिला रहा है, कोई ताज़ा रोटी सेंक रहा है, कोई इत्र छिड़क रहा है, तो कोई पैरों की मालिश कर रहा है। यहां तक कि 4 और 5 साल की मासूम बच्चियां भी खड़े होकर पानी के प्याले पेश करती हैं, मानो कह रहीं हों — “हमारे छोटे-छोटे हाथों से जो हो सकता है, हम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के जुलूस में करेंगे।”
यात्रियों के थके हुए कदम, धूल-धूसरित चेहरे और आँखों में अश्क़ — लेकिन दिल में अजीब-सी रौनक। रास्ता लंबा है, मगर हर कदम पर मोहब्बत का हाथ थामने वाला कोई मौजूद है। लोग अपने घरों के दरवाज़े खोल देते हैं, बिस्तर बिछा देते हैं, और कहते हैं — “यह घर आपका है, मेहमान-ए-हुसैन, आप हमारे सिर-आँखों पर।”
रास्ते भर इराक़ी जनता जायरीन की मेहमान नवाज़ी में जुटी रहती है। सड़क किनारे मुफ्त में पानी, जूस, खजूर, चाय और खाने की व्यवस्था की गई है। कई लोग अपने कैम्प में आराम का न्योता देते हैं, जूतों की पॉलिश करते हैं, बच्चों के पैम्पर से लेकर कपड़े धोने और डॉक्टर की सुविधा तक मुहैया कराते हैं। लगभग 90 फ़ीसदी इंतज़ाम स्थानीय लोगों द्वारा किए जाते हैं।
सफर के दौरान चार साल की बच्चियां भी सर पर पानी और जूस से भरी टोकरी लेकर, मुस्कुराते हुए राहगीरों को पुकारती है – “या जायर… या जायर”। यह मंज़र देख ज़ायरीन के दिल को छू लेता है और यह मंज़र ईमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बेटी बीबी सकीना की याद को ताज़ा कर देती है। मौलाना अबरार हुसैन वारसी बताया कि “रिवायतों के मुताबिक, अरबईन के मौके पर ईमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मज़ार पर सबसे पहले सहाबी-ए-रसूल हज़रत जाबिर इब्न अब्दुल्लाह अल-अंसारी ने हाज़िरी दी थी। आज भी लाखों लोग उनकी इस सुन्नत को निभाने के लिए नजफ़ से कर्बला तक पैदल सफ़र करते हैं। चेहल्लुम के दिन कर्बला में करोड़ों का हुजूम उमड़ता है। शहर में पैर रखने की जगह नहीं होती और आसमान में हवाई जहाज़ पक्षियों की तरह मंडराते दिखाई देते हैं। अरबईन वॉक दुनिया के सबसे बड़े और सबसे रूहानी पैदल सफ़रों में से एक माना जाता है।







