AMETHI NEWS: (डा. रमाकांत क्षितिज) नब्बे के दशक में मेरे गांव हारीपुर, अमेठी में एक संत हुआ करते थे। जिन्हें लोग बंदरहा बाबा के नाम से जानते थे । दुबले पतले से लंबा कद दाढ़ी मूछ नहीं रहते थे, संपत्ति के नाम पर उनके पास कुछ भी ना था। जो वस्त्र पहनते सिर्फ वही, रहने का कोई निश्चित ठिकाना भी ना था। उनके बारे में लोग बताते कि वे कालिकन के आसपास के किसी क्षेत्र से थे । उनके बारे में बहुत व्यक्तिगत जानकारी लोगों को कम ही उपलब्ध थी । मेरे गांव में रामबरन तिवारी जी के यहां एक बार वे कई दिनों के लिए रुके थे। भोजन को लेकर भी उनकी कोई विशेष रुचि न थी ,जो मिला खा लिया, नहीं मिला तो कोई फिक्र भी नहीं ।यदि कोई भक्त कुछ उन्हें दे जाता तो उसे बंदरों को दे देते । वह बंदरों की सेवा करते, इसीलिए उन्हें बंदरहा बाबा के नाम से लोग पुकारने लगे। संत परंपरा की तरह उन्होंने अपना कोई नाम, नाम के साथ दास, भगत, श्री श्री, कोई संख्या ना थी। इन सब चीजों से वे मुक्त हो चुके थे। मैं भी उनसे बचपन में ही बहुत प्रभावित रहता, उन से चर्चा भी करता ,कई बार घर भी आए। मेरा सौभाग्य की उनका स्नेह पाने का अवसर मुझे मिला है, उनका रहना सहना भी अजीब ही था। कभी ठीक से बिस्तर पर भी ना सोते, कई बार तो एक खांची लेते ,उसके ऊपर पैर रख देते, सिर जमीन पर टिका देते और सो जाते। हमारे क्षेत्र में एक बहुत बड़े प्रसिद्ध संत हुआ करते थे, हडीया बाबा। वे जहां भी जाते उनके साथ संतों की टोली होती। किसी समय शायद उसी टोली में होकर बाबा हमारे क्षेत्र में आए और यहीं के होकर रह गए । दूर-दूर से लोग उनसे मिलने आते, लोग अपने धन, अपने व्यक्तित्व से उन्हें प्रभावित करने की कोशिश करते। मैंने कभी नहीं देखा कि वह शिवाय प्रेम के किसी और चीज से प्रभावित हुए हो। मेरे एक मित्र राममिलन शर्मा बंधु उनकी बड़ी सेवा करते । बंदरहा बाबा सचमुच में एक संत, बाहर के जगत के आडंबर से मुक्त हो चुके थे । भीतर की दुनिया में बहुत गहरे तक जा चुके रहे होंगे। एक आनंदित व्यक्ति क्या होता है, यह उनसे मिलकर देखा जा सकता था। बातें तो कभी-कभी आम बोलचाल की भाषा में उटपटांग कर देते, संत की बातें उटपटांग ही लगती है। शब्दों के भ्रम जाल से भी मुक्त हो चुके थे, सीधी सपाट भाषा में अपनी बात कह देते। कभी-कभी कोई भी चीज पीसकर अपने शरीर पर कहीं भी लगा लेते । दुद्धी से बच्चे पटरी पर लिखते उसी दुद्धी से अपने शरीर को रंग लेते। यह उनके लिए चंदन की तरह था,उनके लिए दुद्धी ही सर्वोत्तम चंदन थी। शरीर और शरीर के द्वारा बनाई गई बाह्य जगत की वस्तुएं उनके लिए कोई मायने ना रखती थीं। सामान्य विशेष इन पचड़ों से भी वे बाहर आ चुके थे।परंपरावादी तो बिल्कुल भी न थे। वह तो एक नदी की तरह बह रहे थे ,कैसा कंकड़ कैसा पत्थर कहां मखमली मट्टी, इससे उन्हें क्या! वे तो बस वहे जा रहे थेl उन्होंने अपने आप को कभी तालाब गड़ही नहीं बनने दिया । कभी-कभी तो लोगों को डांट देते ,जो उनकी डांट के बाद उनके पास टिक जाता, वे उससे बातें करते । शायद उनका या कोई टेस्ट लेने का तरीका था, जो पास हो जाता उसे बिठा लेते, जो फेल हो जाता वह स्वयं ही हट जाता । चेला , शिष्य की तो उन्हें उन्हें कोई जरूरत ही ना थी। उन्होंने किसी को अपना शिष्य नहीं बनाया ,किसे गुरु मानते थे, यह भी नहीं पता। उस परम सत्ता से उन्होंने अपने को जोड़ लिया होगा ,जब पावर हाउस से ही जुड़ गए तो, बिजली के तारों ग्यारह हजार बोल्ट या चार सौ चालीस बोल्ट की फिकर कौन करें आज भी हारीपुर आस पास के गांवों में उनकी चर्चाएं होती है ,उनके नाम पर कुछ आयोजन भी होते हैं। जहां तक मुझे लगता है, उनके आदर्शों पर यह आयोजन कहीं दिखते नहीं ! फिर भी जो लोग यह सब करते हैं, अभिनंदन के ही पात्र हैं।बाबा तो इन सब से परे थे, भला किसी नदी को, हवा को, कोई आकार दे सकता है, वह तो अपनी मस्ती में सब जगह विद्यमान है…बाबा को किसी सीमा में बाधा ही नही जा सकता। आज भी उनके चर्चा अमेठी के गांवों में होती ही रहती है।







