Home उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश का पुनर्गठन, समग्र विकास की अनिवार्यता: प्रवीण पांडेय

उत्तर प्रदेश का पुनर्गठन, समग्र विकास की अनिवार्यता: प्रवीण पांडेय

बुंदेलखंड राष्ट्र समिति लगातार उठा रहा है पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग

FATEHPUR NEWS: उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है। इसकी जनसंख्या 25 करोड़ से अधिक है और क्षेत्रफल भी कई देशों से बड़ा है। इतनी विशाल आबादी और भूभाग का एक ही राजधानी और एक ही प्रशासनिक ढांचे से संचालन करना न तो आसान है और न ही व्यावहारिक। यही कारण है कि प्रदेश के अधिकांश हिस्से आज भी उपेक्षित हैं, जहाँ विकास और अवसर केवल चुनावी वादों तक सीमित रह जाते हैं। भारत का इतिहास बताता है कि छोटे राज्य अधिक सक्षम और सफल साबित हुए हैं। उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इन राज्यों के गठन के बाद वहाँ कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ, प्रशासनिक दक्षता बढ़ी, स्थानीय उद्योगों और संसाधनों को प्रोत्साहन मिला और युवाओं को नए अवसर मिले। छोटे राज्यों की अवधारणा संविधान सम्मत है। भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर स्वयं छोटे राज्यों के समर्थक रहे। भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल में उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड का गठन कर देश को नई दिशा दी थी। बुंदेलखंड भी उसी समय बनना था, किंतु उस समय के भाजपा सांसदों और विधायकों ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। भारत रत्न चौधरी चरण सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. चौधरी अजीत सिंह हरित प्रदेश के गठन के समर्थक रहे। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने 2014 में तीन वर्षों में बुंदेलखंड राज्य बनाने का वादा किया था। मायावती सरकार ने विधानसभा से बुंदेलखंड राज्य गठन का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था, लेकिन उस समय की कांग्रेस सरकार ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। यह भी सच है कि भारतीय जनता पार्टी सदा से छोटे राज्यों की पक्षधर रही है। शनिवार को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विज़न 2047 के तहत भारत को विश्वगुरु और विकसित राष्ट्र बनाने का आह्वान कर रहे हैं, तब यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या उत्तर प्रदेश जैसा विशाल राज्य बिना पुनर्गठन के उस लक्ष्य तक पहुँच पाएगा? स्पष्ट है कि यदि पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध और हरित प्रदेश जैसे नए राज्य बनाए जाते हैं, तभी समग्र और संतुलित विकास संभव है। दुर्भाग्य यह है कि कुछ राजनीतिक दल केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी की राजनीति में उलझे रहते हैं। उनके लिए जनता का विकास नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि आज तक उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन पर ठोस पहल नहीं हो सकी। प्रदेश की जनता की आकांक्षाओं, ऐतिहासिक तथ्यों और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए अब और विलंब उचित नहीं है। उत्तर प्रदेश का पुनर्गठन केवल राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों के उज्जवल भविष्य का संकल्प है।