Home उत्तर प्रदेश वन विभाग के आंकड़ों पर सवाल खडे कर रहे लगाए गए पौधे

वन विभाग के आंकड़ों पर सवाल खडे कर रहे लगाए गए पौधे

39 लाख पौधे या 39 लाख सवाल? कागजों में उगा जंगल, धरती पर उजाड़
KUSHINAGAR NEWS: वृक्षारोपण महाभियान-2025 के तहत जनपद में 39 लाख से अधिक पौधे लगाए जाने का सरकारी दावा है, लेकिन धरातल पर हालात कुछ और ही कहानी सुना रहे हैं। वन विभाग के आंकड़ों पर सवाल उठ रहे हैं कि यदि पौधे वास्तव में लगे और जीवित बचे, तो “जंगल” नाम वाले गांव आज भी हरियाली से वंचित क्यों हैं?
फाइलों में लहलहाते पेड़, गांवों में हरियाली की तलाश 
जंगल बेलवा, जंगल खिरकिया, जंगल जगदीशपुर, जंगल अमवा, जंगल पिपरासी—ये वो गांव हैं जिनके नाम में आज भी “जंगल” जीवित है, पर जमीन पर जंगल का नामोनिशान नहीं। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि कभी इन इलाकों में घने पेड़ थे, नाम उसी विरासत की पहचान थे। आज खेत, बस्तियां और खाली जमीन ही नजर आती है।
खुद लिखी जाती है सफलता की कहानी
वन विभाग के अनुसार पिछले तीन वर्षों में करोड़ों पौधे लगाए गए। हर साल लक्ष्य तय हुए, अभियान चले, फोटो खिंचे, प्रेस विज्ञप्तियां जारी हुईं और उपलब्धियां घोषित होती रहीं। पर जब उन दावों को जमीन परखा जाता है, तस्वीर बदल जाती है। जिन जगहों को हरित क्षेत्र बनना था, वहां हरियाली का संकट बना है। सवाल उठ रहा है—यदि पौधे लगाए गए थे तो वे बचे क्यों नहीं? निगरानी और संरक्षण की जिम्मेदारी किसकी थी?
हर वर्ष नए लक्ष्य, पर सर्वाइवल रेट गायब
कई स्थानों पर देखा गया कि पौधरोपण तो हुआ, पर सिंचाई-सुरक्षा नहीं। नतीजा: बड़ी संख्या में पौधे शुरुआती दौर में ही सूख गए। इसके बावजूद हर साल नए लक्ष्य और नई उपलब्धियां घोषित होती रहीं। वन विभाग के लिए सबसे असहज सवाल यही है—लाखों पौधे लगाने के बाद परिणाम कहां हैं? विभाग के पास क्या आंकड़े हैं कि कितने पौधे जीवित हैं, कितने पेड़ बने, और किन स्थानों पर असर दिख रहा है? यदि ये आंकड़े नहीं हैं, तो उपलब्धियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। पर्यावरण प्रेमियों और जागरूक नागरिकों का मानना है कि अब समय पौधों की संख्या गिनने का नहीं, जीवित पेड़ों की गणना करने का है। जब तक वृक्षारोपण अभियानों का स्वतंत्र सत्यापन नहीं होगा और सर्वाइवल रेट सार्वजनिक नहीं होगा, तब तक लाखों पौधे केवल आंकड़ों का हिस्सा बनकर रह जाएंगे।
सवाल सीधा है: यदि कागजों पर 39 लाख पौधों का जंगल खड़ा हो चुका है, तो “जंगल” नाम वाले गांव आज भी जंगल से खाली क्यों हैं? कुशीनगर में हरियाली धरती पर उगी है, या सिर्फ सरकारी फाइलों में—–इसका जवाब आखिर कौन देगा?