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भारतीय संविधान में सामान्य श्रेणी की कोई परिभाषा नहीं: बृजेश तिवारी ने उठाया सवाल, कहा समानता का अधिकार केवल नाम का

PRATAPGARH NEWS: सामाजिक कार्यकर्ता एवं सेवादार बृजेश तिवारी ने भारतीय संविधान में सामान्य श्रेणी की परिभाषा न होने का मुद्दा उठाया है। उन्होंने कहा कि जबकि एससी/एसटी को संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत सन् 1950 से ही परिभाषित किया गया है और ओबीसी को मंडल आयोग की सिफारिश पर सन् 1978 में परिभाषित किया गया, वहीं सामान्य श्रेणी की आज तक कोई संवैधानिक परिभाषा नहीं है। बृजेश तिवारी ने जारी बयान में कहा कि संविधान सबके लिए समान है, फिर सामान्य वर्ग को परिभाषित क्यों नहीं किया गया? उन्होंने सवाल किया कि क्या समानता का अधिकार केवल नाम का रह गया है? उन्होंने बताया कि सामान्य श्रेणी की स्पष्ट परिभाषा निम्न कारणों से आवश्यक है:नीतियों और योजनाओं में पारदर्शिता के लिए।जनसंख्या, आर्थिक सर्वेक्षण और आंकड़ों की सही गणना के लिए।न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए।आरक्षण की समीक्षा और संतुलन के लिए। बृजेश तिवारी ने कहा कि इस विषय पर केंद्र सरकार ने अब तक स्पष्ट परिभाषा लाने का प्रयास नहीं किया। संसद ने भी कोई ठोस कानून नहीं बनाया। नीति आयोग और संबंधित आयोगों ने इस दिशा में कोई ठोस सिफारिश नहीं दी। सभी राजनीतिक दलों ने इसे चुनावी मुद्दा न बनाकर सिर्फ वोट बैंक की राजनीति की। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि सामान्य श्रेणी को भी स्पष्ट परिभाषा दी जाए, ताकि संविधान में वास्तविक समानता, न्याय और संतुलन सुनिश्चित हो सके।