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घरेलू सिलेंडर पर डाका :- आम जनता बेहाल, सड़कों पर खुलेआम हो रहा ‘गैस का काला खेल’

सिस्टम सोया या बिका? घरेलू सिलेंडर पर खुलेआम हो रही लूट! JHANSI NEWS:  जनपद में इन दिनों घरेलू गैस सिलेंडरों की किल्लत ने आम लोगों की रसोई की आग ठंडी कर दी है। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि उपभोक्ताओं को सिलेंडर बुकिंग के बाद लगभग 21 दिन तक इंतजार करना पड़ रहा है, वो भी इस उम्मीद में कि कब उनकी बारी आए और घर का चूल्हा जले। इस वक्त हालात ऐसे बन चुके हैं कि आम आदमी की रसोई पर सीधा हमला हो रहा है। घरेलू गैस सिलेंडर, जो हर परिवार की बुनियादी जरूरत है, अब ‘सिस्टम की साठगांठ’ का शिकार बन चुका है। उपभोक्ता बुकिंग कराने के बाद भी सिलेंडर के लिए तरस रहे हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि वही सिलेंडर खुलेआम सड़कों पर धंधा चमका रहे हैं। सदर बाजार की तस्वीर तो जैसे पूरे सिस्टम की पोल खोल रही है। यहां सड़क किनारे लगे खाने-पीने के हाथ ठेलों पर घरेलू गैस सिलेंडर धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं। यह कोई छिपा हुआ खेल नहीं, बल्कि खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सवाल यह नहीं कि यह हो कैसे रहा है, बल्कि सवाल यह है कि यह हो क्यों रहा है और किसके संरक्षण में हो रहा है? घरेलू सिलेंडर, जिन पर सरकार सब्सिडी देती है ताकि आम आदमी की रसोई चल सके, वही सिलेंडर अब व्यवसायिक उपयोग में झोंके जा रहे हैं। नियम साफ कहते हैं कि व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए अलग कमर्शियल सिलेंडर अनिवार्य हैं, लेकिन यहां तो कानून को ठेले पर रखकर तला जा रहा है।
आम उपभोक्ता गैस एजेंसियों के चक्कर काट रहा है, फोन पर जवाब नहीं मिल रहा, बुकिंग के बाद ‘स्टॉक नहीं’ का बहाना सुनने को मिल रहा है। वहीं दूसरी तरफ ठेला संचालकों के पास सिलेंडरों की कोई कमी नहीं—न कोई इंतजार, न कोई नियम, बस खुलेआम कारोबार।
इस पूरे मामले में गैस एजेंसियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। आखिर बिना एजेंसी या सप्लाई चैन की मिलीभगत के इतने बड़े पैमाने पर घरेलू सिलेंडर सड़कों तक कैसे पहुंच रहे हैं? क्या डिलीवरी के नाम पर कालाबाजारी हो रही है? क्या कुछ लोग मोटी कमाई के लालच में आम जनता के हक को बेच रहे हैं? सबसे चौंकाने वाली बात प्रशासन और संबंधित विभागों की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ है। क्या उन्हें यह सब दिखाई नहीं दे रहा, या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं? अगर कार्रवाई नहीं हो रही तो सवाल सीधा है—क्या इस खेल में ऊपर तक हिस्सेदारी तय है?  साफ लगता है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक संगठित खेल है जिसमें आम जनता सबसे बड़ी पीड़ित है।
यह स्थिति केवल असुविधा नहीं, बल्कि व्यवस्था पर सवाल है। जब रसोई की गैस भी सुरक्षित नहीं, तो आम आदमी किस पर भरोसा करे? अब वक्त आ गया है कि जिला प्रशासन, आपूर्ति विभाग और संबंधित एजेंसियां नींद से जागें और इस ‘गैस घोटाले’ की जड़ तक पहुंचकर दोषियों पर सख्त कार्रवाई करें। कहावत सटीक बैठती है — “अंधेर नगरी, चौपट राजा” — जहां जनता लाइन में खड़ी है और मुनाफाखोर सड़कों पर आग जलाकर पैसा कमा रहे हैं।