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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ‘शंकराचार्य’ के रूप में गाड़ू घड़ा यात्रा का न्योता, शंकराचार्य विवाद के बीच बद्रीनाथ से संदेश आना, शंकराचार्य न मानने वालों के मुंह पर तमाचा,

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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उत्तराखंड स्थित बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले होने वाली सबसे अहम और पवित्र परंपरा, गाड़ू घड़ा यात्रा, में बतौर ‘शंकराचार्य’ शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण भेजा गया है। यह न्योता ऐसे समय पर सामने आया है, जब उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य पद को लेकर विवाद गहराया हुआ है ।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उत्तराखंड स्थित बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले होने वाली सबसे अहम और पवित्र परंपरा, गाड़ू घड़ा यात्रा, में बतौर ‘शंकराचार्य’ शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण भेजा गया है। यह न्योता ऐसे समय पर सामने आया है, जब उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य पद को लेकर विवाद गहराया हुआ है और प्रयागराज माघ मेला प्रशासन व स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है।

विवाद की जड़: शंकराचार्य होने के प्रमाण की मांग

प्रयागराज माघ मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से शंकराचार्य होने से जुड़े प्रमाण मांगे थे। इस पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन को अपना जवाब सौंपा, लेकिन इसके बाद उन्होंने मेला क्षेत्र छोड़कर काशी का रुख कर लिया। यह मामला राजनीतिक और धार्मिक दोनों ही स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया, जिससे पूरे घटनाक्रम को लेकर देशभर में प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।

सीएम योगी से हिंदू होने का प्रमाण मांगकर बढ़ा सियासी तापमान

विवाद उस समय और तेज हो गया, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हिंदू होने का प्रमाण मांगा। उन्होंने इसके लिए 40 दिन का समय निर्धारित किया। इस बयान के बाद मामला केवल धार्मिक बहस तक सीमित न रहकर राजनीतिक विमर्श का भी हिस्सा बन गया, जिससे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों राज्यों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया।

25 जनवरी को भेजा गया था आधिकारिक आमंत्रण

श्री बद्रीनाथ डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत के अध्यक्ष पंडित आशुतोष डिमरी ने बताया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को यह न्योता 25 जनवरी को भेजा गया था। आमंत्रण पत्र में उनसे ऋषिकेश से बद्रीनाथ धाम तक निकलने वाली पवित्र गाड़ू घड़ा यात्रा में भाग लेने की अपील की गई है। यह यात्रा बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले निभाई जाने वाली सबसे प्रमुख धार्मिक परंपराओं में गिनी जाती है।