KAUSHAMBI NEWS : सिराथू तहसील के बम्हरौली गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन कथा व्यास डॉ विशुद्धानंद जी महराज ने समुद्र मंथन, बलि चरित्र, राम चरित्र व श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का प्रेरक प्रसंग सुनाया। कथा व्यास ने बताया कि महाराज परीक्षित ने चौदह रत्नों के महत्व के बारे में जानने की जिज्ञासा प्रकट की।
जिस पर उन्होंने शुकदेव महराज ने बताया कि समुद्र मंथन में मंद्राचल पर्वत को मथानी और बासुकी नाग को रस्सी बनाया गया। राक्षसों ने नाग के मुख वाले हिस्से को और देवताओं ने पूंछ वाले हिस्से को पकड़ा। जब पर्वत समुद्र में डूबने लगा, तब श्रीहरि ने कच्छप अवतार लेकर उसे अपनी पीठ पर धारण किया। मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला। देवताओं और आदि शक्ति की प्रेरणा से भगवान शिव ने इसका पान किया। इससे उनका कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। इसके बाद क्रमशः कामधेनु गाय ऋषियों को, उच्चैश्रवा घोड़ा राजा बलि को और ऐरावत हाथी इंद्र को प्राप्त हुआ। कौस्तुभमणि श्रीहरि ने धारण की। कल्पवृक्ष और अप्सरा रंभा इंद्रलोक की शोभा बढ़ाने लगीं। आठवें रत्न के रूप में महालक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्हें भगवान विष्णु ने वरण किया। नौवें स्थान पर बारुणी (मदिरा) निकली, जिसे राक्षसों ने स्वीकार किया। इसके बाद कथा व्यास ने राज बलि के चरित्र का वर्णन करते हुए बताते है कि भगवान विष्णु वामन के रूप में आकर राज बलि से तीन पग भूमि मांग लेते है। उसके साथ ही कथा में राम चरित्र और भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का कार्यक्रम भी मनाया गया। भागवत में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भक्ति पूर्वक कथा के श्रवण किया व श्रीकृष्ण जन्म का उत्सव मनाया।







