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मजिस्ट्रेट शुरुआती चार्जशीट पर कॉग्निजेंस लेने के बाद भी बाद की ‘क्लोजर रिपोर्ट’ पर विचार करने के लिए मजबूर: इलाहाबाद हाईकोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि मजिस्ट्रेट पुलिस द्वारा फाइल की गई फाइनल रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) पर विचार करने और ऑर्डर पास करने के लिए कानूनी रूप से मजबूर है, उन मामलों में भी जहां उसने पहले की चार्जशीट के आधार पर अपराध का कॉग्निजेंस लिया।

जस्टिस अनिल कुमार-X की बेंच ने कहा कि अगर मजिस्ट्रेट फाइनल रिपोर्ट पर विचार किए बिना मामले में आगे बढ़ता है तो ऐसी कोई कार्रवाई न करना “प्रोसिजरल गैर-कानूनी” माना जाएगा।

कोर्ट ने आगे फैसला सुनाया कि वास्तव में मजिस्ट्रेट को प्राइमरी रिपोर्ट (शुरुआती रिपोर्ट/चार्जशीट) पर कॉग्निजेंस लेने के अपने पहले के ऑर्डर से प्रभावित हुए बिना हर सप्लीमेंट्री रिपोर्ट पर स्वतंत्र रूप से अपना विचार लगाने की ज़रूरत है।

एक ज़रूरी स्पष्टीकरण में कोर्ट ने कहा कि अगर कोई मजिस्ट्रेट, सप्लीमेंट्री रिपोर्ट पर अपनी न्यायिक सोच लगाने के बाद चार्जशीट (प्राइमरी रिपोर्ट) पर संज्ञान लेने के अपने पहले के फैसले के उलट किसी नतीजे पर पहुंचता है तो ऐसी उलटी राय दर्ज करना उसके पहले के आदेश का रिव्यू या रिकॉल नहीं माना जाएगा।

बेंच ने पिछले हफ़्ते ऐसा ही कहा, और एक क्रिमिनल अपील को मंज़ूरी दी, जिसमें अपील करने वालों ने SC-ST Act और इंडियन पैनल कोड (IPC) के तहत दर्ज मामले में कार्रवाई को चुनौती दी।

संक्षेप में मामला

पुलिस ने शुरू में मामले की जांच की और 15 सितंबर, 2023 को अपील करने वालों के खिलाफ IPC की धारा 147, 452, 323, 504, 506 और SC/ST Act के तहत चार्जशीट फाइल की। मजिस्ट्रेट ने 21 दिसंबर, 2023 को अपराधों का संज्ञान लिया।

इसके बाद IO ने आगे की जांच की और 31 मार्च, 2024 को सप्लीमेंट्री रिपोर्ट (फाइनल रिपोर्ट) पेश की, जिसमें यह नतीजा निकाला गया कि अपील करने वालों के खिलाफ आरोप झूठे पाए गए।

इसके बाद की रिपोर्ट, जिसमें आरोपियों को असल में बरी कर दिया गया, उसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने पुलिस की फाइनल रिपोर्ट पर विचार किए बिना 7 अगस्त, 2025 को आरोप तय करने की कार्रवाई शुरू कर दी।

अपील करने वालों ने इसे हाईकोर्ट में यह कहकर चुनौती दी कि आरोप तय करने से पहले कोर्ट का यह फ़र्ज़ है कि वह फाइनल रिपोर्ट पर विचार करे, इस बात को राज्य के वकील ने भी मान लिया।

दूसरी ओर, AGA ने अपील करने वालों के वकील द्वारा बताए गए तथ्यों पर कोई विवाद नहीं किया।

हाईकोर्ट के तर्क

शुरू में हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट अक्सर ऐसी स्थितियों में दुविधा में पड़ जाते हैं, उन्हें लगता है कि एक बार प्राइमरी/शुरुआती रिपोर्ट पर कॉग्निजेंस लेने के बाद, वे अब फंक्टस ऑफिसियो हैं और CrPC की धारा 362 के तहत रिव्यू पर रोक के कारण कोई उल्टा ऑर्डर पास नहीं कर सकते।

हालांकि, बेंच ने इस लॉजिक को “कानून के खिलाफ” बताते हुए खारिज किया, क्योंकि उसने साफ किया कि रिव्यू पर रोक तभी लागू होती है, जब कोर्ट ने किसी फैसले या फाइनल ऑर्डर पर साइन करके “केस का निपटारा” कर दिया हो।

कोर्ट ने कहा कि प्राइमरी रिपोर्ट पर कॉग्निजेंस लेने से केस का निपटारा नहीं हो जाता। बल्कि, मजिस्ट्रेट की ज्यूडिशियल ड्यूटी ‘लगातार’ होती है और उन्हें पुलिस द्वारा जमा की गई हर रिपोर्ट पर अपनी ज्यूडिशियल सोच लगानी चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि अगर कोई मजिस्ट्रेट सप्लीमेंट्री रिपोर्ट के आधार पर अपने पहले के फैसले के उलट किसी नतीजे पर पहुंचता है तो “ऐसी उल्टी राय दर्ज करना उसके पहले के ऑर्डर का रिव्यू या रिकॉल नहीं होगा” बल्कि यह सिर्फ अचानक सामने आए तथ्यों का जवाब है।

कोर्ट ने कहा,

“जैसे इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर को आखिरी लॉजिकल नतीजे तक पहुंचने तक अपनी इन्वेस्टिगेशन जारी रखनी चाहिए, वैसे ही मजिस्ट्रेट की ज़िम्मेदारी तब तक बनी रहती है, जब तक पुलिस अपनी आखिरी पक्की रिपोर्ट जमा नहीं कर देती। इसलिए मजिस्ट्रेट की ज़िम्मेदारी है कि वह न्याय का ध्यान रखे और एक ही केस की इन्वेस्टिगेशन के दौरान जमा की गई सभी पुलिस रिपोर्ट पर विचार करे।”

इसके अलावा, विनय त्यागी बनाम इरशाद अली @ दीपक और अन्य (2013) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि एक सप्लीमेंट्री रिपोर्ट प्राइमरी रिपोर्ट से अलग नहीं है, बल्कि इसे उसका “एक अहम हिस्सा” माना जाना चाहिए।

इसमें यह भी कहा गया कि किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले कोर्ट को इस सेक्शन के तहत जमा की गई सभी रिपोर्ट के कुल असर का मूल्यांकन करना चाहिए, उन्हें एक साथ पढ़ना चाहिए और रिपोर्ट पर गौर करना चाहिए ताकि यह तय हो सके कि क्या यह मानने के लिए काफी आधार हैं कि आरोपी ने अपराध किया।

खास बात यह है कि राम लाल नारंग वगैरह वगैरह बनाम दिल्ली राज्य (एडमिन) 1979, धर्मात्मा सिंह बनाम हरमिंदर सिंह व अन्य 2011 और मरियम फसीहुद्दीन व अन्य बनाम अदुगोडी पुलिस स्टेशन व अन्य 2024 लाइव लॉ (SC) 53 पर भरोसा करते हुए बेंच ने कहा कि मजिस्ट्रेट धारा 173(8) के तहत हर अगली रिपोर्ट पर आदेश देने के लिए बाध्य है, जब तक कि सप्लीमेंट्री चार्जशीट में नए मटीरियल की कमी न हो।

इस पृष्ठभूमि में अपील स्वीकार की गई और कोर्ट ने चार्जशीट का संज्ञान लेने के लिए अपील करने वालों के खिलाफ प्रोसेस जारी करने के आदेश और चार्ज फ्रेम करने के आदेश सहित अन्य सभी परिणामी आदेशों को रद्द किया गया।

बेंच ने ट्रायल कोर्ट को पहले फाइनल रिपोर्ट पर विचार करने और शुरुआती रिपोर्ट (चार्जशीट) और फाइनल रिपोर्ट दोनों पर विचार करने के बाद ऑर्डर पास करने का निर्देश दिया।

इसमें आगे यह भी कहा गया कि अगर इसके बाद वह इस नतीजे पर पहुंचती है कि दोनों रिपोर्टों को मिलाकर पढ़ने से पहली नज़र में अपील करने वालों के खिलाफ मामला बनता है, तभी वह अपील करने वालों के खिलाफ आरोप तय करने के लिए आगे बढ़ेगी।