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पश्चिम बंगाल का 2026 का बजट : ममता के उदार दोस्त क्या मानने से इंकार कर रहे हैं?

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*(आलेख : अर्का राजपंडित, अनुवाद : संजय पराते )*

पश्चिम बंगाल के 2026–27 के बजट को, ‘बंगाल का गौरव’ नाम दिया गया है। यह बजट 4.06 लाख करोड़ रुपये का है। इस बजट का रोडमैप, एक ऐसी सरकार के पंद्रह साल पूरे होने का प्रतीक है, जिसकी सावधानीपूर्वक यह छवि बनाई गई है कि यह सरकार गरीबपरस्त है और  प्रगतिशील सोच रखती है। इस बात को ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सरकार को समर्थन करने वाले एक उदार  नेटवर्क ने आगे बढ़ाया है, जो राज्य के नकद हस्तांतरण  मॉडल को नव-उदारवाद के खिलाफ एक बड़ा मूलगामी विरोध बताता है।

फिर भी, यह दिखावा टूट रहा है। निम्न वर्ग की जीत दिखाने के बजाय, ये कल्याणकारी कार्यक्रम सिर्फ़ ज़िंदा रहने के लिए राहत देते हैं, और एक आत्मनिर्भर उत्पादक अर्थव्यवस्था बनाने में गहरी नाकामी को छिपाते हैं। इस प्रगतिशील ब्रांडिंग का असल में मज़दूर वर्ग और किसानों की कठिनाईयों से कोई लेना-देना नहीं है।

पश्चिम बंगाल के लिए 2026-27 के राजकोषीय रोडमैप से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था संरचनात्मक निर्भरता  और राजकोषीय भंगुरता के चक्र में फंसी हुई है। 21.48 लाख करोड़ रूपये के जीएसडीपी के मुकाबले 2,87,792 करोड़ रूपये की कुल राजस्व प्राप्ति के अनुमान के साथ, राज्य की वित्तीय आमद स्थानीय करारोपण और केंद्रीय करों में हिस्सेदारी पर लगभग उतनी ही निर्भरता के बीच झूल रही है। यह अनुरूपता  एक ठहरे हुए अंदरूनी राजस्व आधार को दिखाती है, जो   स्वतंत्र रूप से अपनी परिसंपत्ति का निर्माण करने में राज्य की नाकामी को रेखांकित करता है। जबकि सरकार राजस्व घाटे में 21,759 करोड़ रूपये की नाटकीय कमी का दावा करती है, ऐसे अनुमान अक्सर कर्ज़ से संचालित   राज्य होने की कड़वी सच्चाई को छिपाते हैं। बाजार से  80,445 करोड़ रूपये के चौंका देने वाले उधार का अनुमान लगाकर, प्रशासन मौजूदा कमजोरियों की भरपाई के लिए राज्य के भविष्य को गिरवी रख रहा है।

राज्य सामाजिक कल्याण के कार्यों पर 1.80 लाख करोड़ रुपये (बजट का लगभग 45%) खर्च कर रहा है, जिसमें लक्ष्मीर भंडार को 15,000 करोड़ रुपये तक बढ़ाना भी शामिल है, ताकि निजी श्रम बाजार की नाकामी की भरपाई के लिए सामाजिक मजदूरी दी जा सकें। नव-उदारवादी दौर में, ये सुरक्षा ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी हैं, लेकिन जब इसे उत्पादन की ताकतों (उद्योग और प्रौद्योगिकी) के विकास के साथ नहीं जोड़ा जाता ; तो ये गरीबी को खत्म करने के बजाय उसे प्रबंधित करने का एक तरीका बन जाती हैं। उद्योग और एमएसएमई के लिए बहुत कम आबंटन (बजट का 1% से भी कम) यह सुनिश्चित करता है कि मज़दूर वर्ग श्रम की एक आरक्षित  सेना बनी रहे, जिन्हें उत्पादक रोज़गार के बजाय पलायन करने या राज्य से मिलने वाले पैसे पर गुज़ारा करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

पूंजीगत व्यय के लिए 86,533 करोड़ रूपये आबंटित किए गए हैं, जो एक मज़बूत अधोसंरचना के निर्माण की योजना बनाने के लिए नाकाफी है। यह एक चूका हुआ  विचार लगता है, जो बंगाल के उद्योगों और खेती-बाड़ी  को बढ़ावा देने के लिए नाकाफी है, जो कि बंगाल को एक नियमित गुज़ारे लायक अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए ज़रूरी है।

*वह असलियत, जिसे ममता के उदार दोस्त छिपा नहीं सकते*

पश्चिम बंगाल बहुत ज़्यादा आर्थिक उतार-चढ़ाव से ग्रस्त है। यह एक ऐसी कड़वी सच्चाई है, जिसे बताने में ममता बनर्जी के उदार दोस्त अक्सर नाकाम रहे हैं। 2025-26 में, राज्य की प्रति व्यक्ति आय लगभग 1,71,184 रूपये थी, जो 2.12 लाख रूपये के राष्ट्रीय औसत से लगभग 20% कम है। यह अंतर प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में पश्चिम बंगाल को भारत में 21वें स्थान पर रखता है, जिससे यह दक्षिणी और पश्चिमी भारत के औद्योगिक महाशक्तियों से काफी पीछे रह जाता है।

घर-परिवारों के वित्तीय स्वास्थ्य की हालत भी उतनी ही चिंता की बात है, क्योंकि आरबीआई के हाल ही के आंकड़ों से पता चलता है कि 2019 और 2025 के बीच इस राज्य में सालाना वित्तीय देनदारी में 102% की बढ़ोतरी हुई है। इसके उलट, वित्तीय संपत्ति में सिर्फ़ 48% की बढ़ोतरी हुई है, जिसका मतलब है कि हर 1 रूपये की बचत पर, कर्ज़ लगभग 2 रूपये बढ़ रहा है। यह असंतुलन इस बात से और साफ़ होता है कि पश्चिम बंगाल पर, अब देश में सबसे ज़्यादा सूक्ष्म वित्त (एमएफआई) कर्ज बकाया है। कई ग्रामीण परिवारों के लिए, बचत अब संपत्ति निर्माण के लिए नहीं है, बल्कि हर हफ़्ते या महीने में एमएफआई का पुनर्भुगतान करने के लिए होती है।

स्वास्थ्य देखभाल और कर्ज तक पहुंच में संकट की वजह से कर्ज़ का यह चक्कर और बढ़ गया है। 2025-26 की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि पश्चिम बंगाल में वित्तीय तनाव के सबसे ज़्यादा मामले हैं, जिससे परिवारों को हॉस्पिटल में भर्ती होने के खर्च के लिए अपनी संपत्ति बेचनी पड़ती है या भारी कर्ज़ लेना पड़ता है। नतीजतन, सोने को गिरवी रखकर कर्ज लेना (गोल्ड लोन) आखिरी उपाय से बदलकर घरेलू कर्ज़ का मुख्य चालक बन गया है ; 2025 के आखिर तक, ये ऋण साल-दर-साल 125% तक बढ़ गए हैं। यह बढ़ोतरी ज़्यादातर सोने की रिकॉर्ड ऊँची कीमतों के कारण और साथ ही सुरक्षित ऋण विकल्पों में कमी की वजह से हुई है, जिससे घरों के पास बहुत कम विकल्प बचे हैं।

राज्य की औद्योगिक बुनियाद भी बहुत कमज़ोर है, यह बात ममता बनर्जी के उदार दोस्त अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। राज्य की अर्थव्यवस्था में विनिर्माण का योगदान सिर्फ़ 18.8% ही है, जो राष्ट्रीय औद्योगिक औसत से कम है। जोर-शोर से प्रचारित ‘वैश्विक व्यापार मेलों (ग्लोबल बिज़नेस समिट्स)’ के बावजूद, 2019 और 2025 के बीच वास्तव में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) का प्रवाह सिर्फ़ 15,256 करोड़ रूपये था, जो महाराष्ट्र या कर्नाटक जैसे राज्यों द्वारा किए गए निवेश का एक छोटा सा हिस्सा है। इसके अलावा, 2025 के उत्तरार्द्ध में पूंजीगत व्यय में 35.1% की कमी आ गई है, जो यह दिखाता है कि राज्य दीर्घकालिक संपत्ति निर्माण के लिए ज़रूरी कारखानों, पुलों और बंदरगाहों पर कम खर्च कर रहा है।

उच्च मजदूरी वाले औद्योगिक रोजगार के अभाव ने पश्चिम बंगाल को वास्तव में श्रम निर्यात करने वाली अर्थव्यवस्था में बदल दिया है। जबकि आधिकारिक  बेरोज़गारी दर 3.6% बताई गई है, बेरोज़गारी भत्ता के लिए बांग्लार युवा साथी की मांग कुछ और ही कहानी कहती है : लगभग 27.8 लाख युवा, जिनमें से कई के पास डिग्री है, उन्हें मूल भत्ता से ज़्यादा वेतन वाला रोजगार नहीं मिल रहा है। इन भत्तों के लिए राज्य के 2026-27 के बजट में 5,000 करोड़ रूपये के आबंटन  को निजी क्षेत्र में खपत की गहरी अधोसंरचनात्मक कमी के लिए मरहम-पट्टी के तौर पर देखा जाना चाहिए। ग्रामीण इलाकों में बताई जा रही 3.1% की बेरोज़गारी दर भी गुमराह करने वाली है, क्योंकि 63.2% आबादी छोटे, अलाभकारी खेती के टुकड़ों में अपना काम करती है, जो छिपी हुई बेरोज़गारी का एक शास्त्रीय मामला है।

पलायन का स्तर राज्य के कार्यबल के अंदर की निराशा को दिखाता है। 2025 के अंत के सरकारी आंकड़ों  के मुताबिक, लगभग 22.40 लाख मजदूर दूसरे राज्यों में काम कर रहे हैं, जबकि श्रमश्री योजना की रिपोर्ट के अनुसार, 31.77 लाख प्रवासी मजदूरों ने लौटकर, स्थानीय मदद पाने के लिए अपना पंजीयन कराया है। 2025 के एक अध्ययन में पाया गया है कि इनमें से 62.9% लोग सिर्फ़ बेहतर रोजगार के मौकों के लिए पलायन करते हैं, और 25% प्रवासी परिवार भेजे गए पैसे का इस्तेमाल सिर्फ़ खाने के लिए करते हैं। आजीविका के लिए यह पलायन इस बात को पुष्ट करता है कि आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए, राज्य छोड़ना ही आधारभूत पोषण की ज़रूरतों को पूरा करने का एकमात्र तरीका है — यह बार-बार दुहराई जाने वाली एक आर्थिक नाकामी है, जिसे मौजूदा सरकार का समर्थन  करने वाले लोग अनदेखा कर रहे हैं।

*बजट में क्या नजरअंदाज किया गया है?*

उद्योग और खनिज के लिए 2,842.96 करोड़ रूपये का आबंटन कुल खर्च का सिर्फ़ 0.70% है। यह बहुत कम निवेश खास तौर पर चिंता की बात है, क्योंकि राज्य अभी ज़्यादा उत्पादकता वाले विनिर्माण रोजगार की कमी से जूझ रहा है। विज्ञान, प्रोद्योगिकी और पर्यावरण के मामले में यह अनदेखी और भी साफ़ है, जिसे सिर्फ़ 155.94 करोड़ दिए गए हैं, जो कुल बजट का लगभग 0.03% है। यह बहुत कम वित्त-पोषण आधुनिक प्रौद्योगिकी में मुकाबला करने की राज्य की काबिलियत को असरदार तरीके से कम कर देती है। जहाँ वैश्विक प्रतियोगी एआई, जैव-प्रौद्योगिकी और हरित ऊर्जा में भारी निवेश कर रहे हैं, वहीं पश्चिम बंगाल का आबंटन, जिसमें से सिर्फ़ लगभग 82 करोड़ रूपये ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए है, यह सुनिश्चित करता है कि राज्य के सबसे तेज़ दिमाग कर्नाटक, तमिलनाडु या महाराष्ट्र जैसे ज़्यादा प्रौद्योगिकी वाले आगे बढ़े हुए राज्यों में लगातार प्रतिभा पलायन (ब्रेन ड्रेन) करते रहें। शोध और विकास कार्यों में निवेश की यह कमी इसी बात को पक्का करती है कि बंगाल एक प्रौद्योगिकी निर्माण राज्य होने के बजाय सिर्फ़ उपभोक्ता राज्य बना रहे, जिससे उत्पादक रोज़गार के सृजन में अंतर और बढ़ जाता है।

सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के लिए सिर्फ 5,858.95 करोड़ रूपये के आबंटन से यह अनदेखी और भी साफ़ हो जाती है, जो बजट का सिर्फ़ 1.48% है। यह देखते हुए कि पश्चिम बंगाल भारत के सबसे ज़्यादा बाढ़ वाले इलाकों में से एक है, जो उत्तर में नदी किनारे के कटाव और दक्षिण में ज्वार-भाटे से जूझता है, यह कम आबंटन  बड़े अधोसंरचनात्मक परियोजनाओं और 1,500 करोड़ रुपए के घाटल मास्टर प्लान जैसे बार-बार आने वाले चुनावी मुद्दों या पूरे राज्य भर की पुरानी नहर प्रणाली को आधुनिक बनाने के लिए काफ़ी नहीं है। इसी तरह, ऊर्जा क्षेत्र को सिर्फ़ 5,372.50 करोड़ मिले हैं, जो कुल खर्च का 1.36% है। इस कम निवेश से राज्य के बहु-प्रचारित  औद्योगिक लक्ष्यों में गतिरोध का खतरा है।

शिक्षा के क्षेत्र में, उच्च शिक्षा के लिए 6,858.69 करोड़ रुपये का आबंटन है, फिर भी यह आंकड़ा मानवीय पूंजी  में गहरे संकट को छुपाता है। जबकि राज्य तरुणेर स्वप्नो जैसी छात्रों को प्रत्यक्ष फंड योजना (डायरेक्ट-टू-स्टूडेंट स्कीम) का आबंटन जारी रखे हुए है, जिसके लिए टैबलेट और स्मार्टफोन के लिए 900 करोड़ रुपये दिए गए थे, शिक्षण की मुख्य अधोसंरचना चरमरा रही है। राज्य में अभी भी सेकेंडरी स्कूलों में शिक्षकों के 35,726 और प्राथमिक शिक्षकों के 13,421 पद रिक्त हैं। यह रिक्तता  काफी हद तक 2016 के एसएलएसटी भर्ती घोटाले का नतीजा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था में गड़बड़ियों के कारण 2025 में लगभग 26,000 नियुक्तियां रद्द कर दी थी।

22,338.08 करोड़ रुपये का स्वास्थ्य बजट दिखाता है कि बीमा की वजह से सार्वजनिक कल्याण का निजीकरण हो रहा है। स्वास्थ्य साथी मॉडल, जिसमें 2.45 करोड़ परिवार शामिल हैं, निजी चिकित्सा पूंजी के साथ दावा निर्धारण करने के लिए सार्वजनिक वित्त का अच्छे से इस्तेमाल करता है। यह सार्वभौमिक कवरेज का दिखावा करता है, जबकि वित्तीय तनाव का मामला ज़्यादा बना रहता है, जिससे गरीबों को बुनियादी निदान  के लिए अपनी संपत्तियां बेचनी पड़ती हैं। ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर-मरीज अनुपात राष्ट्रीय औसत 1:811 से काफी नीचे होने के बावजूद, राज्य के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मज़बूत बनाने के बजाय बजट में निजी अस्पतालों की लाभ-सीमा को प्राथमिकता दी गई है, जिससे आम लोगों के जीने का सवाल बाजार के भरोसे हो गया है।

इस बजट में ‘गर्व’ करने लायक कुछ नहीं है, बल्कि यह स्थाई निर्भरता की ऐसी योजना है, जो लोगों को गरीबी में फंसाए रखता है। असली तरक्की तभी होती है, जब सरकार बिगड़ी हुई व्यवस्था को ठीक करे, एक उत्पादक अर्थव्यवस्था का निर्माण करें, जहाँ मज़दूरों को घर पर ही अहमियत दी जाए, न कि उन्हें आजीविका  के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करने के लिए मजबूर किया जाए। ममता के उदार समर्थक इस दर्दनाक सच्चाई को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं, लेकिन लाखों प्रवासी मज़दूरों और कर्ज़ में डूबकर संघर्ष कर रहे परिवारों के पास ऐसा करने का कोई कारण नहीं है।

*(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।