MIRZAPUR NEWS: इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत की याद में शुक्रवार को चेहल्लुम का मातमी जुलूस शहर में निकाला गया। एक ओर जहां देशभर में आज़ादी का जश्न मनाते हुए ध्वजारोहण हो रहा था, वहीं दूसरी ओर मीरजापुर की गलियां या हुसैन या अब्बास और या सकीना की सदाओं से गूंज रही थीं। कुरैश नगर में मासूम अजादार अपने हाथों में छोटे-छोटे ताजिए और अलम शरीफ लेकर जुलूस चल रहे थे। तेज़ धूप और तपती सड़क के बावजूद उन बच्चों के कदम इमाम हुसैन की मोहब्बत में रुके नहीं। उनकी आंखों में ग़म और होंठों पर मातमी नोहों की सदाएं थी। “कहा हुसैन ने हिंदुस्तान जाने दे”। चेहल्लुम के इस जुलूस में शहर के मशहूर सूफी मौलाना अबरार हुसैन वारसी साहब से मुलाकात हुई । अल्लामा साहब से गुफ्तगू के दौरान उन्होंने बताया कि”करबला का ग़म सिर्फ़ दस मोहर्रम तक सीमित नहीं रहा,असल इम्तिहान उसके बाद शुरू हुआ। कलमा पढ़ने वाले मुसलमानों ने ऐसा ज़ख़्म दिया है जो कभी भर नहीं सकता।” मौलाना अबरार हुसैन वारसी साहब ने बताया कि”कर्बला के मैदान में वही लोग खड़े थे जो ज़ुबान से तो खुद को मुसलमान कहते थे। नबी का कलमा भी पढ़ते थे वही लोग ने नबी के नवासे हज़रत इमाम हुसैन अ.स. को प्यासा शहीद कर दिया। उन जालिमों 6 माह के मासूम अली असगर अलैहिस्सलाम तक को भी बहुत बेदर्दी के साथ शहीद कर दिया । नबी के घराने का क़त्ल कर इतिहास में ऐसा दाग़ छोड़ गए जो कभी मिट नहीं सकता। “कुफ़े से शाम तक का सफ़र जब याद किया जाता है तो दिल काँप उठता है। अहले-बैत को बिना सवारी, जंजीरों और रस्सियों में कैद कर बाज़ारों और दरबारों में घसीटा गया। नबी की नवासी और मौला अली की बेटी हज़रत ज़ैनब स.अ. बेपर्दा होकर भी ज़ालिमों के सामने डटी रहीं और हक़ की आवाज़ बुलंद करती रहीं । “मासूम बीबी सकीना स.अ., जिसने कभी रेत की तपिश तक न जानी थी, नंगे पाँव और जंजीरों में कैदखाने तक ले जाई गई। उनकी सिसकियाँ आज भी हर अज़ादार का दिल चीर देती हैं।”यज़ीद की नस्ल आज भी ज़िंदा है यज़ीद तो मर गया, लेकिन उसकी सोच आज भी बाक़ी है। ताजियों और अलम को देखकर फसाद फैलाने वाले उसी नस्ल के वारिस हैं। जुलूस में कई अज़ादार एक हाथ में अलम और दूसरे हाथ में तिरंगा थामे चल रहे थे, मानो वफ़ा और वतन की एक साथ मिसाल पेश कर रहे हों। जुलूस अपने पुराने रास्तों से गुजरते हुए इमामबाड़ा पहुंचकर समाप्त हुआ। जहां पुलिस और प्रशासन की ओर से सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए थे। जिससे मातमी सफर शांति और अनुशासन के साथ पूरा हुआ।







