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खुले आसमान के नीचे दिव्यांग महिला का अनशन जारी, बना संवेदनहीनता का नजीर

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संवेदनहीन वर्दी ने दिव्यांग महिला को खुले आसमान के नीचे बैठने के लिए किया मजबूर
दबंगों से मिलकर रामकोला थाने का देवान हिमांशु ने बिना किसी आदेश का रोकवाया निर्माण कार्य
प्रातःकाल एक्सप्रेस
कुशीनगर ब्यूरो।जनपद के रामकोला थानान्तर्गत सिंगहा गांव की दिव्यांग महिला अल्पना तिवारी आज संवेदनहीन व्यवस्था की जीती जागती तस्वीर बन गयी है।आरोप है कि थाने पर तैनात दीवान हिमांशु सिंह गांव के दबंगों से मिलकर बिना किसी आदेश के दिव्यांग अल्पना की मकान निर्माण रुकवा दिया,जिससे आहत होकर वह थाने से लगायत एसपी और डीएम से लेकर मुख्यमंत्री को प्रार्थना पत्र देकर न्याय की गुहार लगायी, यहां तक कि राष्ट्रपति से इच्छामृत्यु की मांग भी की, लेकिन किसी ने इस दिव्यांग की पीडा को महसूस नही किया। थक हार कर अल्पना खुले आसमान के नीचे बैठने का निर्णय लिया। वह पिछले 13 दिनों से खुले आसमान के नीचे भूखी-प्यासी अनशन पर बैठी है।चलने-फिरने में असमर्थ अल्पना हर कदम पर सहारे की मोहताज है। न्याय की गुहार के बावजूद न कोई ठोस कार्रवाई हुई, न किसी जिम्मेदार ने उसकी पीड़ा सुनी। तहसीलदार ने भी मौके पर पहुंचकर सिर्फ यह कहकर औपचारिकता निभा दी कि पुलिस को निर्माण रोकने का कोई आदेश नहीं है।

बेशक! जब कानून की रखवाली करने वाली वर्दी ही एक लाचार, दिव्यांग महिला के सपनों पर भारी पड़ जाए, तब प्रशासनिक मनमानी पर सवाल उठना लाज़मी है दिव्यांग अल्पना तिवारी आज उसी सवाल की सबसे दर्दनाक तस्वीर है। कहना ना होगा कि हर कदम पर सहारे की मोहताज अल्पना के लिए दो वक्त की रोटी और सिर पर छत सबसे बड़ी जरूरत है, लेकिन अफसोस संवेदनहीन खाकीधारी हिमांशु सिंह ने उनका आशियाना छीन लिया। न्याय की गुहार लेकर वह दर-दर भटकती रही, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। अंततः उसने अपने कमजोर शरीर को ही अपनी आवाज बना लिया और अपने घर के सामने खुले आसमान के नीचे बैठकर अनशन शुरू कर दिया।
तेरह दिन बीत गए। सुबह की सिहरन और रात की हाड कपकपाने वाली ठंड मे संवेदनहीन प्रशासन की ओर टकटकी लगाये न्याय की बाट जोह रही है लेकिन प्रशासन की संवेदना अभी तक नहीं जागीं। नतीजतन न महिला आयोग, न जिला प्रशासन, न पुलिस के उच्च अधिकारी और न ही कोई जनप्रतिनिधि ने उसके दुखते जख्म पर मरहम रखा, जैसे सबने आंखें फेर लीं हो।
प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा तब दिखी, जब तहसीलदार मौके पर पहुंचे भी तो सिर्फ औपचारिकता निभाकर लौट गए। उन्होंने साफ कहा कि “पुलिस को निर्माण रोकने का कोई आदेश नहीं है।”यही तथ्य पूरे मामले का सबसे बड़ा आरोप है,
जब कोई आदेश नहीं था, तो निर्माण किस अधिकार से रोका गया?
और अगर दीवान हिमांशु द्वारा रोका गया निर्माण कार्य अवैध है, तो अब तक दीवान हिमांशु सिंह के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं?यह सिर्फ एक दिव्यांग महिला का संघर्ष नहीं, यह उस व्यवस्था का क्रूर चेहरा है, जो सबसे कमजोर इंसान को सबसे आसान शिकार मान लेती है। परिजनों का कहना है कि सरकारें मंचों से महिला सम्मान और दिव्यांग अधिकारों की बात करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में एक दिव्यांग महिला भूख से तड़पती हुई न्याय की भीख मांगने को मजबूर है।अल्पना तिवारी का अनशन प्रशासन के माथे पर सवालिया निशान है। अगर अब भी समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों की खुली हत्या मानी जाएगी। सवाल सीधा है कि क्या अल्पना तिवारी को इंसाफ उसकी जान की कीमत पर मिलेगी ?या फिर कुशीनगर की यह चुप्पी एक और बेबस चीख को दफना देगी?