Home उत्तर प्रदेश उपासकों का छलका दर्द गुरु भदंत ज्ञानेश्वर ने दिया करुणा, स्नेह, सानिध्य

उपासकों का छलका दर्द गुरु भदंत ज्ञानेश्वर ने दिया करुणा, स्नेह, सानिध्य

भदंत ज्ञानेश्वर ने छः दशक तक जगाई सेवा और शिक्षा की अलख
KUSHINAGAR NEWS: बौद्ध धर्मगुरु एबी ज्ञानेश्वर के निधन से पूरे विश्व भर के बौद्ध अनुयायियों और उपासकों में गहरा शोक व्याप्त है। भदंत ने वर्ष 1963 से गुरु भूमि कुशीनगर को अपनी साधना और कर्म भूमि बनाया तथा सेवा प्रसार, शिक्षा प्रसार को अपना लक्ष्य बनाया तो असहाय और गरीब परिवार के बच्चों को एक अभिभावक की तरह से सहारा दिया और उन्हें भविष्य का काबिल इंसान बनाया। म्यांमार देश में 10 नवंबर 1936 को जनपद ओक्याब, प्रांत आराक़ान के ग्राम जिम्बेजी में जन्मे ज्ञानेश्वर की छबि पूरे विश्व में बौद्ध धर्मगुरु के साथ साथ अपने शिष्यों, उपासकों के अभिभावक भी थे। दिवंगत धर्मगुरु के बारे में उनके सानिध्य में रहे उपासकों से जब बात की गई तो उनकी आँखें छलक गईं। भदंत के गांव जा चुके कुशीनगर में भीम कला निकेतन के संचालक भीम चरन ने बताया कि भंते जी में करुणा और प्रेम कूट कूट कर भरा था। वह मनुष्य क्या प्रत्येक जीव से स्नेह रखते थे। शारदा सरोज एंड एसोसिएट प्रालि डायरेक्टर शारदा यादव ने बताया कि गुरु जी ने अभावग्रस्त परिवारों के हजारों बच्चों को सहारा दिया और उन्हें पढ़ा लिखकर योग्य बनाया। आज उनके आशीर्वाद से सभी खुश हैं। कुशीनगर टूर एंड ट्रेवल्स प्रालि वाराणसी और ग्रुप ऑफ होटल रॉयल विष्टा की सीईओ श्रीमती सरोज यादव ने उन्हें महान संत बताया जिन्होंने बुद्ध के उपदेशों का पालन कर जन कल्याण किया। थाई मॉनेस्ट्री से जुड़े गाइड ओमप्रकाश कुशवाहा ने कहा कि भंते जी ने कुशीनगर में विभिन्न देशों की बौद्ध मॉनेस्ट्रियो को संरक्षण दिया और शिक्षा की ज्योति जगाई तथा हर जरूरतमंद की समय समय पर मदद की। उनके चले जाने से हर कोई दुःखी है। म्यांमार मंदिर के नजदीकी और यामा कैफे के संचालक टीके राय ने बताया कि गुरु जी ने हम लोगों को जीने की राह दिखाई। भिक्षु संघ के अध्यक्ष के रूप में भिक्षुओं का जहां ख्याल रखा वहीं एक अभिभावक की तरह ख्याल रखा और उनके जीवन यापन के साधन भी मुहैया कराए। बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर में बौद्ध धर्म, साहित्य के अध्ययन के लिए पाली भवन का निर्माण उनके कृतित्व और व्यक्तित्व को महान बनाता है।