हर साल किताबें बदलने से मिलेगा छुटकारा, अभिभावकों पर होगी आर्थिक बोझ कम
BHADOHI NEWS: जिला उपभोक्ता आयोग के रीडर स्वतंत्र रावत ने कहा कि देश के लाखों अभिभावकों और बच्चों की एक ही पीड़ा है। हर साल बदलता पाठ्यक्रम, महंगी किताबें और बच्चों के कंधों पर बढ़ता बस्ते का बोझ। निजी शिक्षण संस्थानों द्वारा मनमाने तरीके से अलग-अलग प्रकाशकों की किताबें लागू कर दी जाती हैं, जिससे न केवल शिक्षा महंगी होती जा रही है बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। इस दौरान उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों के अनुसार स्कूल बैग का वजन बच्चे के वजन के 10 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। बार-बार पाठ्यक्रम बदलने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि एक ही परिवार में बड़े भाई-बहन की किताबें छोटे बच्चों के काम नहीं आ पातीं। श्री रावत ने कहा कि हर साल नई किताबें खरीदने की मजबूरी अभिभावकों पर आर्थिक बोझ डालती है। साथ ही, करोड़ों टन किताबें हर साल रद्दी बनकर पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाती हैं। देश के सभी विद्यालयों चाहे वे सरकारी हों या निजी सभी में आधारित एक समान पाठ्यक्रम लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बच्चा अधिकारी का हो या फिर कर्मचारी, अमीर व गरीब का हो। सभी को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलनी चाहिए। स्कूल का माध्यम अलग हो सकता है, लेकिन पाठ्यक्रम एक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसी दिशा में सरकार द्वारा एक देश, एक परीक्षा (जैसे के माध्यम से आयोजित परीक्षाएं) एक सराहनीय पहल है। अब समय है कि इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए एक देश, एक शिक्षा बोर्ड की दिशा में कदम उठाया जाए। देशभर के सभी बोर्ड सीबीएसई, आईसीएसई, राज्य बोर्ड को एकीकृत कर एक इंडियन एजुकेशन बोर्ड बनाने पर गंभीर विचार होना चाहिए, ताकि शिक्षा सस्ती, समान और पारदर्शी बन सके।







