Home न्यायालय आरोप हत्या का लगा, अपहरण का आरोप निर्मित नहीं,बिना आरोप अपहरण की...

आरोप हत्या का लगा, अपहरण का आरोप निर्मित नहीं,बिना आरोप अपहरण की सजा अवैध -हाईकोर्ट

6
0

कहा अपहरण के संदेह के आधार पर नहीं दी जा सकती सजा , पुख्ता सबूत जरूरी -हाई कोर्ट

संदिग्ध हत्या के 43 साल पुराने केस में अपहरण के आरोप में सात साल की सजा रद

प्रयागराज],विधि संवाददाता:  इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह कहते हुए कि केवल संदेह अथवा शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। आइपीसी की धारा 364 के तहत अभियुक्त की सात साल की सजा 40 साल बाद रद कर दी है। कोर्ट ने कहा अपहरण का आरोप कोर्ट ने निर्मित नहीं हुआ, आरोप हत्या का था, जिसमें सत्र अदालत ने बरी कर दिया,तो अपरहण के आरोप में सजा नहीं दी जा सकती। दोनों अपराध अलग है। मिलते जुलते अपराध नहीं है।बिना आरोप सजा सुनाना गलत है।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार (दशम) की एकलपीठ ने पाया कि अभियोजन अभियुक्त विनोद कुमार के खिलाफ अपहरण का पर्याप्त सबूत नहीं दे सका। अदालत ने कहा, आइपीसी की धारा 364 के तहत अपराध साबित करने के लिए यह साबित करना होगा कि अभियुक्त ने अपहरण किया था और उसकी हत्या करने का इरादा था।
कोर्ट ने कहा,जब अभियुक्त पर केवल धारा 302 आईपीसी के तहत आरोप तय किए गए थे तब धारा 364 आइपीसी के तहत उसे दोषी ठहराया जाना महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दों को उठाता है जिन पर विचार आवश्यक है। क्या इस प्रकार की दोषसिद्धि बिना विशिष्ट आरोप तय किए और बिना धारा 313 सीआरपीसी के तहत अभियुक्त से प्रासंगिक प्रश्न पूछे बिना दर्ज की जा सकती थी? यह समझना कठिन है कि ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को धारा 302 आईपीसी के तहत बरी करने के बाद धारा 364 आईपीसी के तहत दोषी क्यों ठहराया, खासकर तब जब उसने स्वयं पाया था कि अवैध संबंध का कथित मकसद सिद्ध नहीं हुआ था और उन गवाहों की गवाही, जिन्होंने मृतक को उसकी मृत्यु से पहले अपीलकर्ता के साथ देखने का दावा किया था,
विश्वसनीय नहीं थी। ट्रायल कोर्ट ने प्रकरण में दो अन्य अभियुक्तों शिव राम शुक्ला और सुनीत कुमार को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि महेश सिंह की हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं। अपीलार्थी विनोद को धारा 302 आईपीसी के तहत आरोप से बरी कर करते हुए धारा 364 आईपीसी के तहत सिर्फ इसलिए दोषी ठहराया था कि उसे महेश (मृतक) को ले जाते हुए गवाह क्रमांक एक बैजनाथ ने देखा था। मुकदमे से जुड़े संक्षिप्त तथ्य यह हैं कि बैजनाथ सिंह ने इटावा के बरहपुरा थाना में 23 अक्टूबर 1983 को रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इटावा के सत्र न्यायाधीश ने 21 फरवरी 1986 को सजा सुनाई थी।