लाख मन धनवा, करोड़ मन रतनवा, सब बेकार लागेला, बिन सुवनवा भवनवा अन्हार लागेला
मीरजापुर (अमरेश चंद्र पाण्डेय/अभय त्रिपाठी)। नवरात्रि में पूजा-पंडालों के साथ अधिकांश गांवों में चल रही रामलीलाओं में ब्लॉक मुख्यालय के पड़री में "दशरथ विषाद" का पाठ अति मार्मिक रहा।
दरअसल राजा दशरथ के पास क्या नहीं था? उनके पास अपार धन-वैभव, सत्ता और विशाल अयोध्या का साम्राज्य था। लेकिन मन में यह गहरा प्रश्न रहता था कि उनके बाद इस राज्य का उत्तराधिकारी या इसे संभालने वाला कौन होगा। उनके वैभव को देखकर धन के देवता कुबेर लजाते थे और देवताओं के राजा इंद्र ईर्ष्या करते थे। कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा तीनों रानियों के होने के बावजूद, उनका महल और जीवन सूना और अधूरा प्रतीत होता था। वे करवटें बदलते हुए सोचते रहते कि इतना बड़ा साम्राज्य मेरे किस काम आएगा। मेरे चारों ओर सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा दिखाई पड़ रहा है।
राजा दशरथ के दर्द को समझकर उनके कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ ने ऋषि श्रृंगी के द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ कराया, जिससे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न पैदा हुए और वीरान अयोध्या हरी-भरी हो गई।
दशरथ की भूमिका
भगवान राम की इस लीला के मंचन में दशरथ की भूमिका हृदय नारायण ओझा उर्फ झल्लू ने निभाई और अपनी प्रस्तुति से न केवल राजा दशरथ के विषाद को मार्मिक रूप से मंच पर साकार किया, बल्कि जिनके पास सब कुछ है किंतु वंश चलाने वाली संतान नहीं है, वे दर्शक ओझा की मार्मिक प्रस्तुति पर आंसू पोंछते नजर आए। ग्रामीणों ने भी उनकी प्रस्तुति की सराहना की और काफी दर्शकों ने तालियां बजाकर उन्हें शाबाशी दी। अन्य कार्यक्रम भी काफी मनमोहक रहा।